बोलता है उत्तराखंड :नेताओं से तंग है उत्तराखंड का जनजीवन

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नेताओं से तंग है उत्तराखंड का जनजीवन

उत्तराखंड के लोग जब ठान लेते है तो बलिदानों के बाद उत्तराखंड जैसा राज्य बना लेते है। पहाड़ों के लोग जितने सहन सील है उतने ही दृढ़संकल्प भी। ओर यही देखने को मिला वर्तमान लोकसभा चुनाव में। पहले चरण के लोकसभा चुनाव के लिए हुए मतदान के दौरान चुनाव आयोग की तैयारी और बहुप्रचारित पुख्ता व्यवस्थाओं के दावे के बीच उत्तराखंड ने अपने पांच सांसदों को चुनने में बहुत उत्साह नहीं दिखाया है।कई जगह ऐसी तस्वीर भी दिखी। कई स्थानों पर नाराज चल रहे वोटरों को सिस्टम मनाने में सफल नहीं हो पाया, मगर वोटरों ने भी अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया। अलबत्ता, कुछ जगह सिस्टम को वोटरों का गुस्सा थामने में कामयाबी जरूर मिल गई।
पौड़ी लोकसभा सीट पर चौबट्टाखाल विस क्षेत्र के धोबीघाट, जोगीमढी, पटेलधार, लाछी गांवों के निवासियों ने सड़क न बनने पर लोस चुनाव में भागीदारी न करने की बात कही थी। इस पर खुद पौड़ी के डीएम धीराज सिंह गर्ब्याल ने पहल करते हुए प्रयास किए। सड़क को लेकर वन भूमि से संबंधित मसले के निस्तारण के निर्देश दिए। इसके बाद ग्रामीण मान गए। इसी सीट पर आंसौ पल्ला (आंसौ बाखल) के लोगों को मनाने में प्रशासन कामयाब नहीं हो पाया। पौड़ी सीट के अंतर्गत ही चमोली जिले के कफोली, बमियाला, गंडिक व पोखनी के ग्रामीणों को मनाने में सिस्टम को सफलता नहीं मिली। नतीजतन, इन गांवों के 1057 वोटरों ने अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया।

इस दूरस्थ गांव में दो बूथ बनाए गए, मगर मतदान खत्म होने तक वहां कोई मतदाता नहीं पहुंचा। जिला निर्वाचन अधिकारी रंजना के मुताबिक ग्रामीणों को मनाने प्रशासन की टीम भेजी गई थी, मगर मतदाता माने नहीं। वहीं, नैनीताल, अल्मोड़ा, चंपावत व पिथौरागढ़ जिलों में सात बूथों पर भी ऐसी ही स्थिति की सूचना है।
यह बेरुखी नेताओं के वादों से तंग आकर दिखी है। सांसद व विधायकों के गाँव में सिर्फ वोट मांगने जाना और पूरे 5 साल गाँव की सुध न लेना बड़ा कारण रहा। किसी भी ग्रामीण को सरकारी योजनाओं का लाभ न मिलना गाँव में सड़क स्वास्थ्य शिक्षा का अभाव मुख्य कारण रहे,,,,

देवेश आदमी

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