बोलता हैं उत्तराखण्ड आप सब इस रिपोर्ट को जरूर पढ़े और दे अपनी राय पहाड़ के लिए क्या अच्छा और क्या बुरा???

प्रेम पंचोली कि रिपोर्ट

सड़क बहुत  चोड़ी    होगी, चमकती हुई यह सड़क होगी, मोटर वाहन फर्राटे भरेंगे, कभी अवरोध नहीं होगा, ना ही मोटर दुर्घटना होगी, ना कभी भूस्खलन और आपदा के कारण सड़क बन्द रहेगी, वर्षभर लोग चारों धार्मिक स्थलो का दीदार करते रहेंगे और पुण्य कमायेंगे। जहां-जहां से आॅलवेदर रोड़ जायेगी वहां-वहां स्थानीय लोगो को स्वरोजगार प्राप्त होगा। चारो पवित्र धार्मिक स्थल गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ व यमनोत्री सामरिक दृष्टी से भी महत्वपूर्ण है, पड़ोसी दुश्मन राज्य अपनी सीमाओं तक आधुनिक सुविधाओं को जुटा चुका है, इसलिए वाॅलवेदर रोड़ की नितान्त आवश्यकता है। ऐसी सुन्दर कल्पना और सुहावना सपना हमारे प्रधानमन्त्री श्री मोदी ही देख सकते है। अब वह आॅलवेदर रोड़ के रूप में साकार होने जा रही है। ऐसा आॅलवेदर रोड़ महापरियोजना से जुड़े राजनेता और अफसरान गाहे-बगाहे कहते फिरते दिखते हैं।

उल्लेखनीय हो कि यहां आॅलवेदर रोड को लेकर एक दूसरा पक्ष भी सामने आ रहा है। लोगो का कहना है कि हमारे प्रधानमंत्री का यह भी सपना है कि गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाया जाये। इसलिए ‘‘नमामी गंगे परियोजना’’ है। बताया जा रहा है कि नमामी गंगे परियोजना के तहत उत्तरकाशी से गंगोत्री तक 30 हजार हेक्टेयर में वृहद वृक्षारोपण होगा और इन्ही क्षेत्रों से आॅवेदर रोड़ गुजरेगी जहां हजारो पेड़ो का कटान होना तय हो चुका है। गलफत यह है कि पेड़ तुरन्त लगायेंगे भी और तुरन्त उनकी बली आॅल वेदर रोड़ के लिए अन्य वृक्षो के साथ चढ जायेगी। बता दें कि ढालदार पहाड़ों पर एक पेड़ गिराने का अर्थ है 10 अन्य पेड़ो को खतरे मे डालना। इस संवाददाता ने जहां-जहां से आॅलवेदर रोड़ गुजरेगी वहां-वहां के कुछ लोगो से बातचीत की है। भटवाड़ी के ग्रामीण कुलदीप नौटियाल, भटवाड़ी बाजार में वस्त्र विक्रेता मथुरा दत्त रतूड़ी, भटवाड़ी के ग्राम प्रधान संजीव नौटियाल, उत्तरकाशी के वन प्रभागीय अधिकारी संदीप कुमार, जसपुर गांव के विनोद, जोत सिंह, हर्षिल की ग्राम प्रधान बसंती नेगी, उत्तरकाशी के सामाजिक कार्यकर्ता व वरिष्ठ अधिवक्ता डाॅ. नागेन्द्र जगूड़ी, गंगोत्री में दो दशको से रह रहे स्वामी कृष्णा  जीी  हे॰न॰ब॰ केन्द्रीय विश्वविद्याल श्रीनगर गढवाल के प्रोफेसर जे0 पी0 पचैरी, डाॅ0 मोहन पंवार, पूर्व मंत्री मोहन सिंह रावत गाँववासी, अगस्तमुनि से चन्द्रापुरी के पास केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित होटल व्यवसायी जे. पी. नौटियाल, रुद्रप्रयाग के भाजपा विद्यायक भरत सिंह चैधरी, सामाजिक कार्यकत्र्ता नरेन्द्र दत सेमवाल, बुजुर्ग पदम सिंह गुसांई, श्रीनंद जमलोकी, हर्षवद्र्वन, गिरीश बेंजवाल, रूद्रप्रयाग के जिला अधिकारी मंगलेश घिल्ड़ियाल, ब्यूँग गाँव के सामाजिक कार्यकत्र्ता राजाराम सेमवाल, फाटा में ठेकेदार यशोधर अन्थवाल, हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले रघुवरशाह, गुप्तकाशी के कमल रावत, काकड़ा गाड़ में चाय की दुकान चलाने वाले वन पंचायत सरपंच दिनेश रावत, गुप्तकाशी के पास खुमेरा गाँव के सामाजिक कार्यकर्ता आत्माराम बहुगुणा, जिला पंचायत की पूर्व सदस्या उर्मिला बहुगुणा, गोपेश्वर में वरिष्ठ पत्रकार क्रान्ति भट्ट, पत्रकार प्रमोद सेमवाल, गोपेश्वर के मनोज भट्ट, गोपेश्वर के नगर पालिका अध्यक्ष संदीप रावत, चिपको आन्दोलन से जुड़े मुरारी लाल, डाॅ0 गीता शाह, सामाजिक कार्यकत्र्ता और वर्तमान में ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह नेगी, पिलखी गाँव निवासी बलवीर सिंह नेगी, नन्दन सिंह नेगी, श्रीमती कलावती, हेमा बहन, पीपलकोटी के राकेश शाह, होटल कारोबारी विवेक नेगी, शिक्षिका श्रीमती पुष्पा, अलका और शीला सिंह जैसे सैकड़ो जागरूक लोगो के लिए यह आॅलवेदर रोड़ जैसी परियोजना मौजूदा समय में कौतुहल का विषय बनी हुई है।

ज्ञात हो कि श्रीनगर गढवाल मे बद्रीनाथ हाइवे पर वर्षो पुराने स्वस्थ पेड़ों पर आॅलवेदर रोड़ योजना के तहत खूब आरिया चल रही है। जैसे-जैसे पेड़ो की कटाई आगे बढ रही है वैसे-वैसे श्रीनगर शहर की हालात र्निवस्त्र जैसी दिखने लग गई है। इस पर हे.न.ब. केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढवाल में भूगोल विभागाध्यक्ष डाॅ0 मोहन पंवार ने कहा कि अभी तक आॅलवेदर रोड़ की जानकारी विशेषज्ञों को नहीं मिली है। वे चाहते हैं कि इस सड़क के चैड़ीकरण के लिये टिकाऊ डिजायन यहाँ की भूगर्भिक संरचना के अनुसार बनाया जाय। हे.न.ब. केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढवाल में पर्वतीय शोध केन्द्र के नोडल अधिकारी डाॅ0 अरविन्द दरमोड़ा ने कहा कि जंगल बचाकर सड़क बनाने की नयी तकनीकि पर विचार किया जाना चाहिये।

आॅलवेदर रोड़ के कारण ऋषिकेश से बद्रीनाथ और रुद्रप्रयाग-गौरीकुण्ड मार्गों पर सरकारी आँकड़ों के अनुसार अब तक कुल 9105 पेड़ काटे जा चुके हैं। इसके अलावा 8939 और नये पेड़ ऋषिकेश बद्रीनाथ हाइवे पर चिन्हित किये गये हैं। जिसके कटान की स्वीकृति आॅनलाइन ली जा रही है। जबकि उत्तराखण्ड सरकार के अपर मुख्य सचिव (लोनिवि) ओम प्रकाश का दावा है कि इस परियोजना से लगभग 43 हजार पेड़ों का कटान होगा। तिलवाड़ा-गौरीकुण्ड मार्ग पर पीपल के पेड़ भी काट दिये गये हैं। होटल व्यवसायी जे.पी. नौटियाल ने कहा कि उनके होटल के आगे तीन पीपल के बड़े पेड़ यात्रा सीजन में देशी-विदेशी पर्यटकों को छाँव प्रदान करते थे। पीपल के पेड़ों के दोनों ओर गाड़ियां जा सकती थी, उन्हें दुखः है कि इन पेड़ों की बली भी आॅलवेदर रोड के कारण चढ गयी। इसके अलावा उनका होटल भी 2-3 मीटर तक सड़क चैड़ीकरण की जद में आ चुका है, लेकिन उन्हें मुआवजे की राशि का अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं है।

बताया जा रहा है कि सड़क चैड़ीकरण से केदारनाथ हाइवे में रुद्रप्रयाग से लेकर फाटा तक तिलवाड़ा, रामपुर, सिल्ली, अगस्तमुनि, विजयनगर, गंगा नगर, बेड़ूबगड़, सौड़ी, गबनीगाँव, चन्द्रापुरी, भीरी, कुण्ड, काकड़ागाड़, सिमी, गुप्तकाशी, नाला, हयूनगाँव, नारायण कोटी, आदि स्थान आधे अथवा पूर्ण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। जबकि लोगो का विरोध देखकर रुद्रप्रयाग जिले के जिलाधिकारी मंगलेश घिल्ड़ियाल को कहना पड़ा कि बस्तियों के आस-पास 24 मीटर के स्थान पर केवल 12 मीटर भूमि का अधिग्रहण होगा। लेकिन इसकी सच्चाई अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। यहाँ फाटा में हार्डवेयर की दुकान चलाने वाले रघुवरशाह और गुप्तकाशी में कमल रावत का कहना है कि मुख्य मार्ग को छोड़कर नये स्थानों से प्रस्तावित सड़क का एलाइन्टमेन्ट भारी नुकसान का कारण बनेगा। कहा जा रहा है कि केदारनाथ मार्ग पर काकड़ा गाड़ से सेमी होते हुये गुप्तकाशी तक के मार्ग को छोड़कर 10 किमी से अधिक सिंगोली के घने जंगलो के बीच से नया एलाइन्टमेन्ट लोहारा होकर गुप्तकाशी तक किया जायेगा। इसी तरह फाटा बाजार को छोड़कर मैखंडा से खड़िया गाँव होते हुये नई रोड़ का निर्माण किया जाना है। फाटा और सेमी के लोग इससे बहुत आहत हैं। यदि ऐसा होता है तो इन गाँवों के लोगों का व्यापार और सड़क सुविधा बाधित होगी। इसके साथ ही फाटा के पास पौराणिक मंदिर, जलस्रोत भी समाप्त हो जायेंगे इससे लोगों की आस्था को नुकसान पंहुचेगा। उनका कहना है कि जिस रोड़ पर वाहन चल रहे हैं उसी रोड़ पर सुविधा मजबूत की जानी चाहिये। नयी जमीन का इस्तेमाल होने से लम्बी दूरी बढ़ेगी और चैड़ीपत्ती के जंगल भारी मात्रा में नष्ट होंगे। इसी प्रकार रुद्रप्रयाग, अगस्तमुनि दो अन्य ऐसे स्थान हैं जहाँ पर लोग सड़क चैड़ीकरण नहीं चाहते हैं। इस संबंध में विश्व हिन्दु परिषद की कार्यकर्ता उमा जोशी का कहना है कि अगस्तमुनि बाजार को छोड़कर नये स्थान से यदि आॅलवेदर रोड़ बनाई गई तो वनों का बड़े पैमाने पर कटान होगा और यहाँ का बाजार सुनसान हो जायेगा। काकड़ा गाड़ में चाय की दुकान चलाने वाले वन पंचायत सरपंच दिनेश रावत का कहना है कि सरकार केवल डेंजर जोन का ट्रीटमेंट कर दें तो सड़कें आॅलवेदर हो जायेगी उनकी चिंता है कि सड़क चौड़ीकरण से उनका होटल नहीं बच सकता है और वे बेरोजगार हों जायेंगे।

इधर चार धामों में भूस्खलन व डेंजर जोन बेतरतीव निर्माण एवं अन्धाधुन्ध खनन कार्यों से पैदा हुये हैं। रुद्रप्रयाग जिले में रामपुर, सिल्ली सौड़ी बांसवाड़ा सेमी, कंुड, फाटा, बड़ासू आदि स्थानों में लगातार भूस्खलन वाले डेन्जर जोन बने हुये हैं। बद्रीनाथ मार्ग पर देवप्रयाग, सिरोहबगड़, नन्दप्रयाग के पास मैठाणा, चमोली से पीपलकोटी के बीच 10 किमी सड़क और बिरही, गुलाबकोटी, हेलंग, हाथी पहाड़, पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, लामबगड़, विष्णु प्रयाग के निकट भी डेंजर जोन बने हुये हैं। इनके आस-पास से बाईपास के लिये भी कहीं से सड़क नहीं बन सकती है। गुप्तकाशी के आगे खुमेरा गाँव में सामाजिक कार्यकर्ता आत्माराम बहुगुणा और जिला पंचायत की पूर्व सदस्या उर्मिला बहुगुणा ने बताया कि केदारनाथ के लिये लगभग 23 हेली कम्पनियों को मिले लाइसेन्स के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। गुप्तकाशी, नारायणकोटी, फाटा से जाने वाली हैली कम्पनियों के हेलीकप्टर प्रतिदिन 28 बार उड़ान भरते हैं। इस तरह 23 कम्पनियों के हेलीकप्टर कुल 644 बार उड़ान भरती है। इसके कारण हिमालय की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इस तरह बढ रहे इयर प्रदूषण के कारण यहां पालतू और वन्य पशु खतरे में पड़ गये हैं। इस कारण भी कई बार कितने ही जानवरों की पहाड़ों से कूद कर मृत्यु हो चुकी है।

बताते चलें कि मौजूदा समय में आॅलवेदर रोड़ के नाम पर बेहिचक सैकड़ों पेड़ कट रहे हैं। लोगो का कहना है कि बद्रीनाथ हाईवे के दोनो ओर कई ऐसे दूरस्थ गाँव है, जहाँ बीच में कुछ पेड़ों के आने से मोटर सड़क नहीं बन पा रही है। कई गाँवों की सड़कें आज भी 2013 की आपदा के बाद से नहीं सुधारी जा सकी है। गोपेश्वर के नगर पालिका अध्यक्ष संदीप रावत ने बताया कि सम्पूर्ण परियोजना को शुरु करने से पहले पहाड़ों की भूगर्भीय और भौगोलिक जाँच की जानी जरुरी थी। ताकि भविष्य मे लामबगड़ और सिरोहबगड़ जैसे नए भूस्खलन जोन न बन सके। उन्हांेने ने कहा कि गौचर, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली और पीपलकोटी में स्थानीय जनता की परिसंपतियों पर क्षरण मूल्य लागू न किया जाय। निर्माण के दौरान मार्ग अवरुद्व होने पर जनता को होने वाली परेशानी के हल को हाईवे पर मौजूदा वैकल्पिक मार्गों की व्यवस्था से की जाय। वन संपदा को होने वाले नुकसान के आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाए, साथ ही योजना का निर्माण सुनिश्चित तरीके से हो, जिससे कम से कम वनस्पतियों को नुकसान हो, सड़क चैड़ीकरण शुरु होने से क्षेत्र के लोगों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये योजना सुनिश्चित की जानी चाहिए। चारधाम यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों को निर्माण कार्यों से कोई दिक्कत न हो, इसके लिये यात्रा शुरु होने से पहले ही रोडमैप तैयार किया जाए और बदरीनाथ हाईवे पर तीन धारा और जोशीमठ में पिकनिक स्पाॅट जैसे प्राकृतिक स्थलों के साथ कोई छेड़-छाड़ न की जाए। चिपको आन्दोलन से जुड़े रहे मुरारी लाल ने कहा कि पहाड़ों में निर्माण कार्य का मलवा आपदा का कारण बन रहा है, उनका सुझाव है कि मलवा बंजर जमीन को आबाद कर सकता है, जिस पर वृक्षारोपण करके सड़क को भी टूटने से बचाया जा सकता है। डाॅ0 गीता शाह का मानना है कि पर्यावरण और विकास दोनों की चिंता साथ-साथ करनी चाहिये विकास की अन्धीदौड से पर्यावरण को खतरा न पहुँचे, उन्होने कहा कि इस दिशा में शोध व अध्ययन की आवश्यकता है। श्रीनगर, रुद्रप्रयाग से होते हुये कर्णप्रयाग, चमोली, पीपलकोटी, जोशीमठ तक टू लेन सड़क कुछ जगहों को छोड़कर सम्पूर्णतः बनी हुई है। यहाँ पर नन्दप्रयाग से चमोली पीपलकोटी के बीच ऐसे डेंजर जोन है जहाँ यात्रा सीजन में सड़कें टूटती रहती है। श्रीनगर से आगे भी सिरोहबगड़ एक बड़ा भूस्खलन क्षेत्र है जहाँ पर जान माल का खतरा बना रहता है। ऐसे डेंजर जोनों से गाड़ियों की आवाजाही रखने के लिये लगातार काम होता रहता है लेकिन हर बरसात में इनकी संवेदनशीलता कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। इन स्थानों पर चैड़ी सडक बनाना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

सनद रहे कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने आॅलवेदर रोड़ बनाने की घोषणा उत्तराखण्ड विधान सभा चुनाव प्रचार के वक्त मे की थी। तब से अब तक यह चर्चा रही है कि पहाड़ों के दूरस्थ गाँव तक सड़क पहुँचाना अभी बाकी है। सीमांन्त जनपद चमोली में उर्गम घाटी के लोग सन् 2001 से सुरक्षित मोटर सड़क की माँग कर रहे हैं। यहाँ कल्प क्षेत्र विकास आन्दोलन के कारण सलना आदि गांवो तक जो सड़क बनी है उस पर गुजरने वाले वाहन मौत के साये में चलते हैं। यहाँ पर सड़क की माँग करने वाले प्रसिद्व सामाजिक कार्यकत्र्ता और वर्तमान में ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह नेगी कहते हैं कि यहाँ 3500 कि जनसंख्या वाले क्षेत्र में कोई पलायन नहीं है। वे अपने जंगल लगा रहे हैं और गाँव तक पहुँचने के लिये कठिन रास्तों के कारण दोनों ओर 35 किमी सड़क चाहते हैं। पिलखी गाँव निवासी बलवीर सिंह नेगी का कहना है कि चीन सीमा पर मलारी से आगे रोड़ बहुत चैड़ी है। वे कहते हैं कि बद्रीनाथ मार्ग पर भूस्खलन क्षेत्रों का ट्रीटमेंट हो जाय तो बाकी रोड़ टू लेन बनी हुई है। ग्रामीण नन्दन सिंह नेगी दुखीः होकर कहते हैं कि सड़कों पर डामरीकरण के बाद बार-बार केबिल बिछाने के नाम सड़कें टूटती रहती है। जिसके कारण डामर भी उखड़ते हैं और सरकारी धन का दुरुपयोग होता है, उनका कहना है कि डामरीकरण से पहले ही सड़कों के किनारों के काम सभी विभागों को सामंजस्य के साथ पूरे कर लेने चाहिये। महिला नेत्री कलावती और हेमा का कहना है कि जोशीमठ से होकर बद्रीनाथ जाने वाली सड़क को ही आॅलवेदर का हिस्सा मान लेना चाहिये। क्योंकि यहां सड़क पहले से ही चैड़ी है।

जोशीमठ के लोग हेलंग-मरवाड़ी बाईपास बनाने का विरोध कर रहे हैं। जबकि वर्षो से बद्रीनाथ का रास्ता जोशीमठ से बना हुआ है। जोशीमठ में तीर्थयात्री नृसिंह मंदिर का दर्शन करते हैं और यहाँ हजारों स्थानीय लोगों की आजीविका होटल, रेस्टोरेंट आदि से चलती हैै। दूसरा अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य और सीमान्त क्षेत्र का यह मुख्य स्थान है। पत्रकार कमल नयन का कहना है कि सड़क निर्माण का मलवा सीधे अलकनंदा में उड़ेला जा रहा है। जबकि यहीं पर जोशीमठ और बद्रीनाथ के बीच आधा दर्जन से अधिक डेंजर जोन पाण्डुकेश्वर, गोविन्दघाट, लामबगड़, बलदौड़ा पुल आदि स्थानों पर देखे जा सकते हैं। जहाँ वर्षों पुराने समय से निरन्तर भूस्खलन हैै। इसको सुधारने का जितना भी काम अभी हो रहा है, उससे ऊपरी हिस्से के जंगल और ग्लेश्यिर द्वारा बने मलवों के ढेर लगातार गिरते जा रहे हैं। यहां दोनों ओर की ट्रेफिक हरेक घंटे मे रोकनी पड़ती है। लोगो का कहना है कि यहां 20 किमी के क्षेत्र में कहीं भी दो लेन सड़क नहीं बन सकती है। पीपलकोटी के राकेश शाह बताते हैं कि सड़क चैड़ी होगी, यातायात सुलभ हो जायेगी मगर सड़क के ऊपरी साइड की दुकाने हमेशा के लिये समाप्त इसलिए हो जायेगी कि उसके बाद ऊपरी हिस्से में कोई भूमि नहीं बचती है। सड़क चैड़ीकरण के नाम पर दो बार सर्वे हो चुका है लेकिन यह भी तय नहीं हुआ कि प्रभावित लोगों को मिलने वाले मुआवजे की व्यवस्था कैसी होगी?

इस यात्रा मार्ग पर होटल व्यवसाय से जुड़े विवेक नेगी को चिन्ता है कि निर्माण कार्यों का मलवा नदी में गिराया जा रहा है जबकि नदी सूख रही है। अब तो नदी भी आॅलवेदर रोड़ के कारण मलवे के लिए उपयुक्त डम्पिंग यार्ड बन गया है। बताया कि इस मार्ग पर दुकान, ठेली, चाय का ढाबा चलाने वाले छोटे व्यावसायों को ऐसा कोई नोटिस नहीं आया कि सड़क चैड़ीकरण के कारण उनको उक्त स्थान से हटना पड़ेगा। आॅलवेदर रोड़ यहां आम लोगो में दहशत भी फैला रही है। जबकि होना यह चाहिए कि इस दौरान जिला पंचायत की भूमि पर ऐसे व्यापारियों के लिये दुकानो की व्यवस्था करनी भी सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिये। उनका यह भी कहना है कि केवल दिल्ली मे बैठकर सड़क चैड़ीकरण का गूगल मैप सामने रखकर के चारों धामों के जन जीवन पर संकट पैदा करने जैसी स्थिति बना रहे हैं। यहां सड़क किनारे होटल चलाने वाले व्यवसायी कहते हैं कि सीमा सड़क संगठन और कम्पनियों के काम करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है। इसलिये राष्ट्रीय राजमार्ग विस्तारीकरण में प्रभावित परिवारों की अनदेखी भारी पड़ सकती है। पीपलकोटी में नाम ना छपवाने बावत कुछ शिक्षिकायें कहती है कि पहाड़ों की भूगर्भिक स्थिति को बाहर की निर्माण कम्पनियाँ नजरअंदाज कर देती है। वे निर्माण करते समय भारी विस्फोटों का इस्तेमाल करते हैं। पहाड़ों के जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और भूस्खलन की समस्या दिनों दिन बढ़ रही है। कहा कि तीर्थ यात्रियों के लिये पहाड़ केवल सैरगाह बन रहा है जो आॅलवेदर रोड बनने के बाद और अधिक बढ जायेगा। उनका कहना है कि पीपलकोटी से चमोली राजमार्ग के बीच कुछ स्थानो पर सक्रिय बड़े भूस्खलनों की एक सूची है। अच्छा हो कि ऐसे खतरनाक जोन पहले आधुनिक तकनीकि से ठीक किये जाने चाहिये।

सभी मौसम सड़क परियोजना एक महत्वाकांक्षी काम है वे समझते हैं कि पर्यावरण के कारणों पर आपत्तियां होंगी लेकिन वे दिशा निर्देशों का पालन करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करेंगे। कहा कि सभी मौसमों की सड़कों की परियोजना का निर्माण अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के सख्त पालन के साथ किया जा रहा है, ताकि उचित परिशोधन पर विशेष जोर दिया जा सके और उन्हें प्रतिरोमेंधक बना दिया जा सके। अगले दो वर्षों में उत्तराखंड में 2019 तक लगभग 50,000 करोड़ रुपये की 70 सड़कों का निर्माण होगा। जिसमें सभी मौसमों की चारधाम रोड परियोजना और भारतमला योजना के अंतर्गत मंजूरी दे दी गई हैं। उन्होंने सभी मौसम सड़क परियोजनाओं पर सक्रिय रूप से काम करने की प्रशंसा की है, जो चार प्रसिद्ध हिमालयी तीर्थस्थलों को जोड़ती है। सभी मौसम सड़क परियोजनाओं से कुल 900 किमी में से 400 किमी के लिए काम किया जा रहा है।
– (नितिन गडकरी, केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री) 
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The road will be very chaotic, it will be a flashing road, motor vehicles will fill up, there will be no obstruction, no motor accident, nor will the road stop due to landslide and disaster, throughout the year, people will continue to display four religious places and earn virtue. Local people will get self-employed wherever and wherever the weather will fall. Gangotri, Kedarnath, Badrinath and Yamanotri are also important from the strategic point of view of the four sacred religious places, the neighboring enemy state has assembled modern facilities to its boundaries, hence there is a dire need of the Valverer Road.


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