राज्यपाल की कुर्सी तक ऐसे पहुंचे गरीबी में बचपन बिताने वाले भगत सिंह कोश्यारी, पढ़ें खास बाते

हमारे भगत दा उत्तराखंड के भगत दा मजबूत और बड़ा विशाल दिल के स्वामी भगत दा बोले तो भगत सिंह कोश्यारी जी अब महामहिम हो गए है हमारे भगतदा को महाराष्ट्र राज्यपाल की कुर्सी भाजपा रूपी पौधे की सिंचाई, गुड़ाई, निराई के प्रतिफल में मिला है। हम सभी जानते है कि भगत दा का संपूर्ण जीवन आरएसएस और पार्टी को समर्पित रहा है।


भगत दा ने अपनी कर्मभूमि पिथौरागढ़ को बनाया।
ओर फिर एक गरीब परिवार से निकलकर विधान परिषद सदस्य, विधायक, मुख्यमंत्री, राज्यसभा सदस्य, लोकसभा सांसद और अब राज्यपाल की कुर्सी तक पहुंचे 75 वर्षीय भगत सिंह कोश्यारी जी की सादगी का हर कोई कायल है


बता दे को भगत सिंह कोश्यारी जी के पिता गोपाल सिंह कोश्यारी किसान और मां मोतिमा देवी सामान्य घरेलू महिला थीं। ओर भगत दा के माता-पिता का जीवन सादगी से भरा था।ओर ठीक उनकी ही झलक बचपन से ही भगतदा में भी दिखाई देने लगीं थीं। भगत दा के परिवार की आजीविका का साधन खेती था। इस कारण इनका प्रारंभिक जीवन काफी गरीबी में बीता।


भगत दा ने प्रारंभिक शिक्षा प्राथमिक विद्यालय महरगाड़ से प्राप्त की। जूनियर हाईस्कूल की शिक्षा घर से 8 किमी दूर शामा से हासिल करने वाले भगत दा ने हाईस्कूल की शिक्षा कपकोट से और इंटर की शिक्षा पिथौरागढ़ से हासिल की। भारी आर्थिक संकट के बीच भगत दा ने बीए और एमए की पढ़ाई अल्मोड़ा महाविद्यालय से की।

  फिर इसके बाद एमए अंग्रेजी कोश्यारी जी साल 1966 में आरएसएस के संपर्क में आए कोश्यारी ने संघ की मजबूती के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। आरएसएस के प्रचारक रहे कोश्यारी ने वर्ष 1977 में पिथौरागढ़ में सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की। सरस्वती शिशु मंदिर में लंबे समय तक अध्यापन भी किया। छात्र राजनीति से राजनीति की शुरुआत करने वाले कोश्यारी जी ने साल 1989 में अल्मोड़ा संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा।पर इस चुनाव में उनको हार मिली पर कोश्यारी जी ने जनता से जुड़ाव को हीं छोड़ा ।


आपको बता दे कि भगत दा 11 भाई-बहनों में नौवीं संतान हैं। उनसे पहले 8 बहनों का जन्म हो चुका था। पारिवारिक जन बताते हैं कि कोश्यारी का नामकरण के समय हयात नाम रखा गया था। एक चचेरे भाई का नाम भी हयात होने के कारण इस होनहार बालक का नाम भगत सिंह रखा गया। कोश्यारी के छोटे भाई जगत सिंह नामती चेटाबगड़ गांव में रहते हैं। वह कई बार प्रधान रह चुके हैं। सबसे छोटे भाई नंदन सिंह कोश्यारी वरिष्ठ पत्रकार हैं।
आपको ये भी बता दे कि अल्मोड़ा से एमए की पढ़ाई करने के बाद भगत सिंह कोश्यारी साल 1964 में एटा (उत्तर प्रदेश) के राजा रामपुर इंटर कॉलेज में बतौर प्रवक्ता नियुक्त हुए। कुछ समय तक अध्यापन कार्य करने वाले कोश्यारी पिथौगढ़ लौट आए और इसी धरती को अपनी कर्मभूमि बना लिया।
तो भगत दा ने साल 1975 में पर्वत पीयूष साप्ताहिक समाचार पत्र का संपादन और प्रकाशन का कार्य भी किया और जनसमस्याओं से सीधे जुड़े रहे। भगत दा की उस जमाने मैं अपनी बेबाक टिप्पणी, संपादकीय और अग्रलेखों से जनसमस्याओं को निर्भीकता और निष्पक्षता के साथ उठाते रहे।
आज भी पर्वत पीयूष का बदस्तूर प्रकाशन होता है। भगतदा ने उत्तरांचल प्रदेश क्यों पुस्तिका से राज्य स्थापना की मुहिम छेड़ी।
ये स्याद ही सब लोग जानते हो कि आपातकाल में भगत सिंह कोश्यारी लगभग दो साल तक उन्होंने अल्मोड़ा और फतेहगढ़ जेल की यात्रा की।
जी हां आपातकाल में 3 जुलाई 1975 से 23 मार्च 1977 तक वह जेल में बंद रहे। पर अपनी जेल यात्रा के दौरान भी भगत सिंह कोश्यारी अपने साथी आंदोलनकारियों के लिए उत्प्रेरक की भूमिका में रहे।
हमारे भगत दा का प्रिय भोजन खिचड़ी है। बहराल बोलता उत्तराखंड की तरफ से भगत दा को बहुत बहुत बधाई , सुभकामनाये,

 



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