गेंद मेला, पोड़ी गढ़वाल का एक अनोखा खेल

मकरसंक्रांति के दिन जनपद पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर, दुगड्डा और द्वारीखाल ब्लाक के कुछ स्थानों में एक अनोखा खेल खेला जाता है। जिस खेल का नाम है गेंद मेला । यह खेल शक्ति परीक्षण का खेल माना जाता है। इस मेले में न तो खिलाडियों की संख्या नियत होती है और ना ही कोई खास नियम। इस खेल में दो दलों को चमड़ी से मढ़ी एक गेंद को अपनी सीमा में ले जाना होता है। यह खेल कई समय से चलता हुआ आ रहा है। यह खेल खेलना इतना आसान नहीं होता है। इस खेल में कई बार गेंद वाला नीचे गिर जाता है जिसे गेन्द का पड़ना कहते है| गेंद छीनते वक़्त कई लोगों को चोटें भी लग जाती हैं ऐसी लोगो को फिर बाहर निकाल दिया जाता है और होश आने पर वे फिर खेलने जा सकते हैं। आपस में शक्तिपरीक्षण का यह अनोखा खेल 4 से 5 घन्टे तक चलता है और जो दल गेन्द को अपनी सीमा में ले जाते हैं वहीं टीम विजेता मानी जाती है। कहा जाता है की इस खेल की शुरूआत यमकेश्वर ब्लाक की थलनदी में हुई थी। स्थानीय लोगों के अनुसार मुगलकाल में राजस्थान के उदयपुर और अजमेर से लोग यहां आकर बसे थे इसलिए यहाँ के नाम भी उदेपुर वल्ला, उदेपुर मल्ला,उदेपुर तल्ला एवम उदेपुर पल्ला (यमकेश्वर ब्लाक) व अजमीर पट्टिया(दुगड्डा ब्लाक)हैं। यह खेल आज भी इन्हीं लोगो के बीच खेला जाता है। दुगड्डा में यह मवाकोट में खेला जाता है, यमकेश्वर में थलनदी के साथ ही किमसार, त्योडों, ताल व कुनाव नामक स्थान पर खेला जाता है। वहीं द्वारीखाल में यह डाडामंडी व कटघर में खेला जाता है जो की उदेपुर व ढागू के लोगो के बीच होता है। इस तरह से यह गेंद मेंला पौड़ी गढ़वाल का एक अनोखा खेल है, जिसे खेलना आसान तो नहीं है लेकिन रोमांच से भरपूर ज़रुर है।

 

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