उत्तराखंड में ऐसा हश्र होता है आंदोलनकारी का ना मान ना सम्मान,ऐसे ही हो गया एक युग का अंत

बाबा बमराड़ा ऐसे जाएंगे सोचा तो नही था, क्योंकि उस राज्य में जहां आंदोलनकारियों के नाम पर मलाई काटने वालों की कमी ना हो वहां उत्तराखंड आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले बाबा बमराड़ा गुमनामी के काले अंधेरे में हमसे दूर निकल जाएंगे सोचा नही था।लेकिन ये होना था क्योंकि बाबा बमराड़ा एक समाजसेवी और उत्तराखंड के लिए दिल से सोचने वाले आंदोलनकारी जो थे। क्योंकि अगर उत्तराखंड आंदोलन का श्रेय लेने की होड़ लेने वालों की दौड़ में शामिल होते तो आज किसी बड़े राजनीति पद पर होते या फिर उनका कद इतना ऊंचा था कि प्रदेश का सत्ता सुख भी वो भोग लेते तो किसी अचरज की बात नही होती।आज हमारे बीच बाबा बमराड़ा नही है लेकिन ये बात सौ फीसदी सच है कि मथुरा प्रसाद बमराड़ा यानि बाबा बमराड़ा की उत्तराखंड राज्य बनने के बाद किसी आम आदमी से भी ज्यादा उपेक्षा हुई है।

क्या वजह रही कि सता के लालची राजनीतिक दलों ने बाबा बमराड़ा को वो सम्मान नही दिया जो कि उनको मिलना चाहिए था। क्या वजह रही कि बाबा बमराड़ा ने जो सपना उत्तराखंड के लिए सोचा था उसे कोई भी राजनीतिक दल पूरा नही कर सका। क्या वजह रही कि बाबा बमराड़ा से प्रदेश की दशा दिशा और विकास के लिए कोई भी मार्गदर्शन नही लिया गया। बाबा बमराड़ा इतना तो समझते ही थे कि क्यों अलग राज्य की अलख जगाने के सपना उन्होंने देखा था। बाबा बमराड़ा उर्फ मथुरा प्रसाद बमराड़ा उत्तराखंड राज्य आंदोलन की नींव रखने वालों में शुमार बाबा बमराड़ा के जीवन के आखरी दिनों के बारे में यही कहा जाता रहा कि उत्तराखंड बनने के बाद उन जैसे आंदोलनकारी की घोर उपेक्षा हुई है। सच्चाई यही है कि उत्तराखंड बन जाने के बाद सत्ता में आई राजनीतिक पार्टियों ने तो उन्हें नजरअंदाज किया ही, उत्तराखंड क्रांति दल और आंदोलनकारी संगठनों के लिए भी उनकी कोई अहमियत नहीं रही।बाबा बमराड़ा का जीवन शुरू से अंत तक संघर्षों के खिलाफ आंदोलन जैसा रहा।सन 1941 में बाबा बमराड़ा का जन्म इडवाल्स्यू पट्टी के ग्राम पडियां में हुआ था बचपन में ही मां परमेश्वरी के निधन से आहत बाबा बमराड़ा का लालन पालन उनके पिता कुलानंद बमराड़ा ने ही किया।गांव के किशौली प्राथमिक स्कूल में पढ़ने के बाद उनके पिता ने उनका दाखिला मथुरा के एक संस्कृत स्कूल में करवा दिया लेकिन बाबा बमराड़ा का दिल संस्कृत की पढ़ाई में नही लगा और वो मायानगरी मुंबई में फिल्मों में अपना भाग्य आजमाने चले गए लेकिन मुंबई में भी बात नही बनी और वो दिल्ली पहुंचे जहां 1967 में उनके पिता ने उनके लिए फिर दिल्ली में चश्मे की दुकान खोली।लेकिन यहां भी किस्मत ने उनका साथ नही दिया और चश्मे की दुकान आग की भेंट चढ़ गई।लेकिन इसी दौरान ऐसा कुछ हुआ जिसने उनके अंदर अपनी मातृभूमि के लिए कुछ कर गुज़रने की अलख जगा दी ।दरअसल उस वक्त के दौर में रेडिया अपने सुनहरे दौर में था और ऐसे ही एक कार्यक्रम में गहने चोरी करने वाले एक पात्र को उत्तराखंड से जोड़कर दिखाया गया जिसपर काफी हंगामा हुआ था उस दौर में इंदिरा गांधी ने भी नाराज़गी जाहिर की थी और रेडियो को माफी मांगने के लिए भी कहा था।यही वो वक्त था जब अलग राज्य की अलख बाबा बमराड़ा के मन में जागृत हुई और वो निकल पड़े थे अलग राज्य के आंदोलन की भूमिका बनाने।स्व इंद्रमणि बड़ोनी के साथ उन्होंने कंधे से कंधा लगाया था और उत्तराखंड आंदोलन के अग्रणी रहे बाबा बमराड़ा उत्तराखंड अलग राज्य के आंदोलन की अलख जगाना वर्ष 1973 से से शुरू कर दिया था। उन्होंने पृथक राज्य की मांग को लेकर पौड़ी में सन 1974 को 10 दिन का अनशन, 1977 में उत्तराखंड के गांव-गांव में घूम जनजागरण, वर्ष 1974 से 79 के बीच तीन बार जेल यात्रा के साथ राज्य गठन तक निरंतर आंदोलन किया, लेकिन सरकार ने उनके 1994 में जेल न जाने के कारण आंदोनकारियों को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित ही रखा। इससे आहत बाबा के जीवन-यापन पर लगातार बुरा असर पड़ता चला गया।शासन प्रशासन की उपेक्षा से नाराज़ बाबा को जब कुछ ना मिला तो बाबा ने 13 जून 2016 से शहीद स्थल देहरादून में भूख हड़ताल शुरू कर दी थी लेकिन कुछ दिनों बाद प्रशासन ने उन्हें दून चिकित्सालय भर्ती कर दिया था।

करीब 15 महीनों तक दून अस्पताल में मुफलिसी का जीवन गुज़ारने के बाद उनकी मौत हो गई।प्रदेश में करीब चार दशकों तक हुए हर जनाआंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदार रहे।लेकिन उसके बावजूद शासन प्रशासन से उन्हें वो मान सम्मान नही मिला जिसके वो हकदार थे।ढोगी बाबाओं के आगे नतमस्तक रहने वाला शासन प्रशासन एक ऐसे आंदोलनकारी को क्यों भूल गया जो कि मिट्टी से जुड़ा आंदोलनकारी था आखिर क्या वजह रही कि बाबा बमराड़ा की मौत पर भी कोई भी प्रशासनिक अधिकारी या नेता उन्हें आखिरी श्रद्धांजलि देने नही पहुंचा क्या शासन प्रशासन के पास इतना भी पैसा नही था कि वो बाबा बमराड़ा का अंतिम संस्कार भी ना करा सकें ।

 

 

 

 

 

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