असली बाहुबली अब बने हर दा मिशन 2019 मे राहुल के सारथी !

पूरा उत्तराखंड का नेता जिसे माना जाता है जो गढ़वाल ओर कुमाऊँ को एक साथ लेकर चलता है जिसने पहाड़ हो या मैदान दोनो तरफ ही अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत रखा जो गाँव के गधेरों से से निकलकर उन पदों तक पहुचा जहा पहुचने का मॉर्ग सिर्फ त्याग, तपस्या ओर मेहनत के सिवा दूसरा रस्ता नही ओर यही मेहनत और तपस्या का परिणाम है कि बंदे मे आज भी दम है। जो हर मुश्किल से मुश्किल समय ओर समस्या से निकलकर खिल कर फिर बाहर आता है वो हरीश रावत कहलाता है  
ये वो हरीश रावत है जो भले ही चुनाव हारा हुवा खिलाड़ी हो पर ज़िन्दगी नही । अब तो सच मे यही लगता है कि इस हरीश रावत की लड़ाई खुद से है किसी ओर से नही समय कैसा भी ओर कितना भी खराब क्यो ना आया हो पर हर दा ने कभी ना सियासत के अखाड़ा को बाय बाय किया ओर ना ही वो मैदान छोड़ा जिसमे सिर्फ जनता राज करती है । भले ही जनता के इस मैदान मे हर बार जिंदाबाद के नारे लगते हो लेकिन ये वही मैदान भी है जो कभी भी मुर्दाबाद के नारे आपके सामने लाग दे । चुनाव मे हार ओर जीत लगी रहती है इस बात को हरीश रावत से बेहतर कोन जान ओर समझ सकता है तभी तो देखी बंदा आज भी खड़ा है । हरीश रावत जनता के बीच हमेशा रहे है फिर उस जनता ने चाहे हरीश रावत की आलोचना की हो या उन्हें गले लगाया हो पर हर दा ने अपनी जमीन नही छोड़ी वो लगातार जनता के बीच जाते रहे जिसका लाभ कांग्रेस पार्टी को भी मिल रहा है और हरीश रावत को भी क्योकि वो आज भी युवाओ के बीच, ओर जनता की बात को समझ रहे है सुन रहे है कि आज क्या कहता है जमाना । ताकि आगे सबको साथ लेकर मिशन 2019 पर फोकस पूरा रहे हरीश रावत वो नेता है जो हर दिन अपडेट रहते है कि कहा क्या किसने बोला और क्या हो रहा है और सोशल मीडिया मे भी वो पीछे नही कांग्रेस पर्टी के प्रति सच्चे सिपाही वाली उनकी इस खूबी की वजह ओर अनुभव के कारण ही राहुल गांधी ने उन्हें सीडब्ल्यूसी सदस्य बनाने के साथ ही राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी भी सौंपी है ओर असम का प्रभारी बनाया है। बस फिर क्या हर दा के राजनीतिक दुश्मन जल भून गए और हरीश रावत को नेता मानने वाले खुश ।   
अल्मोड़ा जिले के मोहनरी गांव के गाड-गधेरों और खेत-खलिहानों में खेल-कूद कर बड़े हुए हरीश रावत पर राहुल गांधी ने विस्वास जताया है राहुल गांधी ने हरीश रावत को कार्य समिति में शामिल कर संदेश दिया है कि पार्टी में मजबूत जगह उन्ही को मिलेगी जो संघर्षशील और जुझारू नेता हो ।
हाईकमान के इस फैसले के बाद जहा हरीश रावत के विरोधियो को तगड़ा झटका लगा तो कांग्रेस की राजनीति में हर दा का कद और बढ़ा है। ये पहली बार हुवा है जब उत्तराखण्ड के किसी नेता को आलाकमान द्वारा एक साथ इतने बड़े पदों से नवाजा गया वो बुरा समय भी था जब 2017 में हर दा सीएम थे राज्य के ओर कांग्रेस प्रदेश में बुरी तरह चुनाव हारी थी बस उसके बाद तो पिछले 15 महीनों मे मानो राज्य कांग्रेस ने हरीश रावत को भूला दिया जो या जनाकर अंजान बनने वाला हिसांब था लेकिन हरीश रावत लगे रहे अपने साथ 10 से 12 लोगो की टीम के साथ काम करते रहे ओर अब ये तय माना जा रहा है कि हरीश रावत नैनीताल लोकसभा सीट से मैदान मे उत्तर सकते है ओर राज्य की पांचों सीटों को जिताने का भार भी अब उन पर होगा ।  
साल 1973 से हरीश रावत ने अपनी राजनीतिक पारी का आगज़ किया कुछ महत्वपूर्ण बाते बोलता उत्तराखंड़ आपके आगे ला रहा है , रावत अकेले वो नेता है जो अपने प्रतिद्वंदियों से मात खाने के बावजूद हर बार उससे ज्यादा सीख कर और मजबूत तरिके से उभरे। केंद्र में कैबिनेट मंत्री पद ओर राज्य मैं मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी बैठे ये सब कुछ कठिन चुनोतियो के बीच हुवा लगभग 18 साल पहले केंद्र में राजग सरकार थी तो उत्तराखण्ड का जन्म हुआ। उस समय हरीश रावत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में सामने आए । 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में हरीश रावत के दम पर कांग्रेस सत्ता मे आयी पर मुख्यमंत्री नारयण दत्त तिवारी को राज्य का बनाया गया आपको बता दे कि हर दा पहली बार 1980 में केंद्र की राजनीति में शामिल हुए। तब वह अल्मोड़ा से सांसद चुने गए थे। 1984 एवं 1989 में भी उन्होंने संसद में इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 1992 में उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का महत्वपूर्ण पद संभाला। जिसकी जिम्मेदारी वह 1997 तक संभालते रहे। राज्य निर्माण के बाद रावत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए। उनकी अगुवाई में 2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत प्राप्त हुआ और उत्तराखण्ड में कांग्रेस की सरकार बनी। नारायण दत्त तिवारी के मुकाबले मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से पिछड़ने के बाद उसी साल नवंबर में रावत को उत्तराखण्ड से राज्यसभा भेजा गया। उसके बाद हरीश रावत
लगातार चार बार लोकसभा चुनाव हारे पर हिमत ना हारे फिर 2009 में हरिद्वार से सांसद बनकर उन्होंने ये बता    दिया कि हार के बाद भी जीत है
तत्कालीन मुख्यमंत्री मनमोहन सिंह सरकार में रावत को पहले राज्यमंत्री और बाद में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 2012 में कांग्रेस एक बार फिर प्रदेश की सत्ता में आई तो उस बार भी पार्टी आलाकमान ने विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया। जिसका विधायकों ने भारी विरोध किया। तब बहुगुणा सत्ता चला ही रहे थे कि 16-17 जून साल 2013 में आई प्राकतिक आपदा से निपटने में राज्य सरकार की नाकामी की खबरे तेज़ जो गई जिसके बाद विजय बहुगुणा को अपनी कुर्सी गवानी पड़ी ओर एक फरवरी 2014 को हरीश रावत को उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री बना दिया गया ।लेकिन यहा से चुनोतियाँ ओर मजूबती के साथ हरीश रावत के आगे थी
राज्य को आपदा से उबारा गया तो अपनी सरकार को बचाने की सबसे बड़ी चुनोती थी सब कुछ ठीक ही चल रहा था जैसे तैसे हरीश रावत बैसाखियों के सहारे सरकार चला ही नही रहे थे बल्कि राज्य के पर्वतीय जिलो को पहचान दिलाने मे जुटे थे तो उस दौरान बहुगुणा को अपना नेता मानने वाले लगातार परेशानी पैदा करते रहते थे इसी बीच साल 2016 ओर 18 मार्च का दिन काला दिवस के रूप मे जाना गया जब सत्ताधारी कांग्रेस विधायकों के मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ बगावत शुरू कर दी ओर परिणाम ये रहा कि राज्य ने पहली बार सरकार की बर्खास्तगी और राष्ट्रपति शासन देखा। विधानसभा में बजट प्रस्ताव रखे जाने के दौरान सत्ताधारी दल के नौ विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था पर हरीश रावत तब भी शांत होकर अपनी राजनीतिक चातुर्य का परिचय देते रहे और विषम परिस्थितियों में प्रदेश का विकास किया ।     जब हरीश रावत की सरकार ने फ्लोर टेस्ट पास किया तो उस समय यदि हरीश रावत दुबारा सरकार ना चलाते ओर उसी समय चुनाव के मैदान मे उत्तर जाते तो राज्य मे फिर से उनकी आज सरकार होती लेकिन उस दौरान हरीश रावत ने कहा था कि ये राज्य इस बगवात ओर घटिया राजनीति की वजह से एक साल पीछे चला गया है और इस समय वो अगर चुनाव के लिए जाते तो राज्य का विकास और पीछे चला जाएगा इसलिए उन्होंने फ्लोर टेस्ट पास करने के बाद फिर सरकार चलाई फिर 2017 में विधानसभा चुनाव मे पूरी कांग्रेस लड़खड़ा गई और खुद हर दा किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। बस फिर क्या था हर दा की पूरी तरह से राजनीतिक हत्या करने के लिए सभी उनके विरोधी गुट बनाकर षडयंत्र करने लगे ओर हरीश रावत पहले से भी ओर जायदा सक्रीय हो गए ओर इससे घबराया हुआ कांग्रेस का एक गुट आये दिन कुछ ना कुछ बयान देकर राजनीतिक अवरोध हरीश रावत के लिए लगातार पैदा करता रहा। लेकिन ये तो हरीश रावत है जिनके बयान नाप तोल कर निकल रहे है और तथ्य और आकड़ो के हिसाब से वो अपनी बात और कांग्रेस की बात रखते है               बहराल अभी तो हर दा का मिशन 2019 है जिसमे राज्य की पांचो सीटो पर जीत दिलाना ओर खुद नैनीताल से जीत कर आने पर फोकस है उसके साथ सबसे बड़ा मिशन हर दा का 2019 मे संबको साथ लेकर चलना ओर राहुल गांधी को पीएम बनाने का सकल्प है ज़िस पर वो सारे मत भेद भुलाकर फिर से कांग्रेस के सभी नेताओ को एक साथ लेकर अपने मिशन की ओर बढ़ना चाहते है फिलहाल देखते है हर दा अब क्या कुछ नया करके दिखाते है क्योकि इस बार उनके पास जो पद है वो अब तक के सभी पदो से महत्वपूर्ण है उनके लिए पर इस बीच अगर कोई राज्य  का नेता ये कह दे कि अब हर दा  का  उत्तराखंड की राजनीति मे जायदा योगदान ना होगा तो ये उनकी भूल होगी फिर वो नेेता बीजेपी का हो या कांग्रेस का  क्योकि यहा से फिर नई पारी का आगज़ हो गया है हर दा  का

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