केदारनाथ आपदा की छठी बरसी भी हो चली है ओर जिंदगी पुरानी राह पर लौटने लगी है. केदारनाथ धाम में श्रद्धालुओं का रेला उमड़ रहा है ओर स्थानीय लोग आपदा के निशानों से पार पाने में जुटे हुए हैं.
रिपोर्ट – अजेंद्र अजय जी की

मै रुद्रप्रयाग जिले के विजयनगर (अगस्त्यमुनि) कस्बे में जब भी जाता हूं तो आंखें नदी की धारा में घर की तलाश करने लगती हैं. यह अनुमान लगाना कठिन हो जाता है कि मंदाकिनी की धारा आज जहां बह रही है, क्या वहां कभी एक हंसती-खेलती बस्ती रही होगी? मंदाकिनी की लहरों के साथ तमाम स्मृतियां मस्तिष्क पटल पर उभर आती हैं. घर, आंगन और बचपन की यादें. बगीचे में लगे आम-अमरूद के पेड़. गर्मियों की भरी दुपहरी में जिनके नीचे बैठना पंखे की हवा से भी ज्यादा सुकून देता था. घर के समीप प्राचीन ‘पुराना देवल’ मंदिर की घंटियों की आवाज, जो प्रातः व सांय काल आध्यात्मिक तरंगों का आभास दिलाती थी. स्मृतियां अनंत हैं. मगर जब आंखों से स्मृतियों के जाले साफ करता हूं, तो मंदाकिनी के इर्द-गिर्द सिर्फ तबाही के निशान दिखाई देते हैं. और वह भयानक मंजर याद आता है, जिससे दिल सहम उठता है.


साल 2013 की 16 व 17 जून को उत्तराखंड की केदारघाटी समेत अनेक स्थानों पर प्रकृति ने कहर बरपाया था. बारिश का पानी प्रलय के रूप में सामने आया.
इस हिमालयी सुनामी में केदारनाथ समेत पूरे प्रदेश में हज़ारों लोगों को असमय काल के मुंह में समाना पड़ा. बड़ी संख्या में लोगों को बेघर होना पड़ा. 11,759 भवनों को आंशिक क्षति पहुंची. लगभग 11,091 मवेशी मारे गए. 4200  गांवों का संपर्क पूरी तरह से टूट गया था. 172 छोटे-बड़े पुल बह गए और कई कई सौ किलोमीटर सड़क लापता हो गई. 1308 हेक्टेयर कृषि भूमि आपदा लील गई.


दरअसल, उत्तराखंड व प्राकृतिक आपदाओं का संबंध पुराना है. भूस्खलन, बादल फटना, आसमानी बिजली गिरना, बाढ़, भूकंप की घटनाएं पहाड़ों में निरंतर होती रहती हैं. यह भी कह सकते हैं कि आपदा पहाड़ के लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है. ज्ञात इतिहास में वर्ष 1803 में गढ़वाल में आए भूकंप का उल्लेख मिलता है. ‘गढ़वाल अर्थक्वेक’ के नाम से जाने जाने वाले इस भूकंप ने पूरे उत्तर भारत को हिला दिया था. भूकंप से गढ़वाल में भारी तबाही मची. कहा जाता है कि भूकंप से अस्त-व्यस्त हो चुके गढ़वाल की राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर गोरखाओं ने इस पर आक्रमण किया था और वर्ष 1804 में गढ़वाल क्षेत्र गोरखाओं के कब्जे में आ गया.

इसके अलावा उत्तराखंड के इतिहास में दर्ज प्रमुख आपदाओं में वर्ष 1868 में बिरही की बाढ़, 1880 में नैनीताल के पास भू-स्खलन, 1893 में बिरही में बनी झील, 1951 में सतपुली में नयार नदी की बाढ़, 1979 में रुद्रप्रयाग के कौंथा में बादल फटने की घटनाएं शामिल हैं। वर्ष 1991 में उत्तरकाशी में भूकंप, 1998 में रूद्रप्रयाग व मालपा में भू-स्खलन, 1999 में चमोली व रूद्रप्रयाग में भूकंप, 2010 में बागेश्वर के सुमगढ़ में भू-स्खलन, 2012 में उत्तरकाशी व रूद्रप्रयाग में बादल फटने व भू-स्खलन जैसी ये कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जिनमें अब तक हजारों लोगों की जानें चली गई हैं.
ये प्राकृतिक आपदाएं रोकी नहीं जा सकती हैं. मगर ठोस प्रबंधन व तकनीकी प्रयोगों से आपदा न्यूनीकरण के प्रयास किए जा सकते हैं. केदारनाथ आपदा में कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी, यदि आपदा प्रबंधन तंत्र मजबूत और प्रभावी होता और समय पर राहत और बचाव अभियान चलता. किसी भी आपदा के बाद सरकारी तंत्र बड़ी-बड़ी घोषणाएं करता है. बैठकों के दौर चलते हैं लेकिन जब अगली आपदा आती है तो पता चलता है कि पिछली आपदा के बाद की गई तमाम का कवायदें सिफर साबित हुई हैं.


केदारनाथ में आई आपदा के बाद मदद में जुटे सेना के 20 जवान शहीद हो गए थे. हालांकि इस दौरान 1 लाख 35 हजार लोगों को बचाया जा सका.

इतने कम मुआवजे में कैसे हो जीवन यापन?

आपदाओं का एक स्याह पक्ष और भी है. आपदा में जानमाल की जो क्षति होती है, उसका दंश उनके परिजनों को जीवन भर सालता रहता है. मगर आपदा का असली पहाड़ उन पर टूटता है जिनकी जान तो बच जाती है, किंतु वो अपने घर, खेती और पशुओं को गंवा देते हैं. आपदा पीड़ितों की स्थिति शरणार्थियों-सी हो जाती है और वह दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होते हैं. सरकारी मानकों के हिसाब से पीड़ितों को जितना मुआवजा मिलता है, उसमें अधिकतम एक परिवार का साल भर का गुजारा चल सकता है. पीड़ित इस मुआवजे को सरकार की कृपा मान कर संतुष्ट हो जाते हैं.

केदारनाथ त्रासदी के बाद गठित पीड़ितों के संगठन “केदारघाटी आपदा पीड़ित विस्थापन और पुनर्वास संघर्ष समिति” के आंदोलन के फलस्वरुप उस वर्ष प्रदेश सरकार ने मानकों में कुछ फेरबदल किया. सरकार ने बेघर हुए लोगों को प्रति वयस्क को परिवार मानते हुए सात लाख रुपये भवन निर्माण हेतु दिए। कल्पना की जा सकती है कि सात लाख में कोई व्यक्ति कैसे भूमि खरीदेगा और कैसे मकान बनाएगा ? हालांकि सरकार का यह मानक एक ही वर्ष चला. अगले वर्ष आई आपदा के पीड़ितों को फिर से पुराने मानकों के अनुसार 2 या 3 लाख रुपये का मुआवजा वितरित किया जाने लगा.

घटना के छह साल बाद पीड़‍ितों को पुनर्वास नहीं
यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आपदा आने पर सरकारी मशीनरी का पूरा ध्यान निर्माण/ पुनर्निर्माण कार्यों को संपन्न करने अथवा इसके लिए केंद्रीय सहायता हासिल करने में रहता है. प्रकृति की मार के पीड़ितों के फोटो कुछ समय के लिए राजनेताओं व स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ राशन, खाद्य सामग्री आदि लेते हुए अखबारों में दिख जाते हैं. मगर इसके बाद पीड़ितों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है. पहाड़ में प्रतिवर्ष ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है.

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केदारनाथ धाम की यात्रा की थी.

 

लोक कल्याणकारी राज्य में सरकार से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह पीड़ितों के विस्थापन, पुनर्वास व जीवन-यापन के लिए प्रयास करे. मेरी एक जनहित याचिका पर वर्ष 2016 में नैनीताल हाईकोर्ट ने ‘अजेंद्र अजय व अन्य बनाम उत्तराखंड सरकार’ के मामले में फैसला दिया था कि आपदा पीड़ित एक “विशेष श्रेणी” में आते हैं. कोर्ट ने कहा कि अपने नागरिकों के जीवन व स्वतंत्रता की सुरक्षा करना राज्य सरकार की संवैधानिक बाध्यता है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उन्हें पुनर्वास का अधिकार है. कोर्ट ने प्रदेश सरकार को यह भी निर्देश दिए कि इस विशेष वर्ग को पर्याप्त मुआवजा दिया जाना चाहिए, ताकि वे नए सिरे से अपने को व्यवस्थित कर सकें.

उत्‍तराखंड में संवेदनशील गांवों की संख्‍या 400 पहुंच गई है
एक बड़ी समस्या और भी है, जिस पर समय रहते गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है. सरकारी आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो आज उत्तराखंड में आपदा की दृष्टि से संवेदनशील और अति संवेदनशील गांवों की संख्या 400 पहुंच गई है. ये गांव वर्षों से अपने विस्थापन व पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं. पूर्व की सरकारों द्वारा इस ओर अपेक्षित ध्यान ना दिए जाने के कारण इन गांवों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. यह सुखद है कि वर्तमान की त्रिवेंद्र रावत सरकार ने पुनर्वास की प्रक्रिया को शुरू किया है लेकिन राज्य सरकार के पास संसाधन सीमित हैं. राज्य के अपने संसाधनों के बूते इतने गांवों का विस्थापन संभव नहीं है. इनमें से कई गांव ऐसे हैं जो आपदा के मुहाने पर हैं. खासकर बरसात के समय ग्रामीणों की पूरी रात आंखों में गुजर जाती है. बरसात के समय कई बार उन्हें भरोसा नहीं होता कि वह अगली सुबह का उजाला देख भी पाएंगे कि नहीं ?

लेकिन वह परिस्थितियों के सामने विवश हैं. उनके सम्मुख आपदा से जूझने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. यदि देखा जाए तो इन ग्रामीणों से निरीह प्राणी शायद ही दुनिया में कोई और होगा, जो अपने घर-बार, खेती-बाड़ी व पशुओं को छोड़कर जाए तो कहां जाए ? एक तरफ काल का भय है तो दूसरी तरफ जीवन यापन की मजबूरी. काल के भय के सामने जीवन यापन की मज़बूरी भारी पड़ती दिखती है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और आपदा पीड़ितों के लिए संघर्षरत ‘केदारघाटी आपदा पीड़ित विस्थापन व पुनर्वास समिति’ के अध्यक्ष रहे हैं )



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