आपके उत्तराखंड राज्य का गठन यूं तो पहाड़ी जिलों के विकास और पलायन जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए हुआ था. लेकिन सत्ता के चरम पर पहुंचने की लालसा ने इन सपनों को कहीं पीछे छोड़ दिया.। यहा नेताओ का विकास अधिक हुवा ओर पहाड़ बदहाल ही रहा अपने 18 सालों में आज ये पहाड़ी प्रदेश अब तक 8 मुख्यमंत्री देख चुका है. 18 साल के इस सफर में इस राज्य ने जितने सियासी साजिशों का सामना किया है, शायद ही देश के किसी अन्य राज्य ने किया हो.
राज्य गठन होने के बाद भारतीय जनता पार्टी के पास ज्यादा सीटें थी. जिसकी वजह से यूपी विधान परिषद के तत्कालीन सदस्य नित्यानंद स्वामी को प्रदेश की बागडोर दी गई. हालांकि स्वामी ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं बचा पाए और पार्टी के कहने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. स्वामी का कार्यकाल 9 नवम्बर 2000 से 29 अक्टूबर 2001 तक चला.

नित्यानंद स्वामी से इस्तीफा लेने के बाद उस दौरान राज्य में कैबिनेट मंत्री भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया गया था। इसके बाद साल 2002 में राज्य में पहली बार विधानसभा चुनाव करवाए गए. ओर इस चुनाव में भाजपा की हार हुई और कोश्यारी को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। भगत सिंह कोश्यारी 30 अक्टूबर 2001 से 1 मार्च 2002 तक राज्य की सीएम रहे.

साल 2002 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को जीत मिली. कांग्रेस के कद्दावर नेता और उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके दिवंगत एनडी तिवारी राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री बने. दिवंगत एनडी तिवारी राज्य के पहले और अबतक के वे आखिरी नेता रहे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया. हालांकि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के कारण उन्हें सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा. दिवंगत एनडी तिवारी 24 मार्च 2002 से 7 मार्च 2007 तक मुख्यमंत्री रहे.

साल 2007 में राज्य में विधानसभा के दूसरे चुनाव हुए जिसमें भाजपा ने जोड़ तोड़ कर सरकार बनाई । पार्टी ने कड़क मिजाज के लिए जाने वाले मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया. इसी के साथ खंडूरी 8 मार्च 2007 को राज्य के चौथे मुख्यमंत्री बने. लेकिन राजनैतिक उठा-पटक के चलते खंडूड़ी को पद से इस्तीफा देना पड़ा. उन्होंने 23 जून 2009 को सीएम पद से इस्तीफा दे दिया.
फिर भुवन चंद्र खंडूड़ी के बाद रमेश पोखरियाल निशंक राज्य के नए मुख्यमंत्री बने. लेकिन उन पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से पार्टी की साख लगातार गिरती गई. जिसको देखते हुए बीजेपी ने चुनाव से ठीक 6 महीने पहले दोबारा खंडूड़ी पर दांव लगाया और उन्हें सीएम बना दिया. हालांकि खंडूड़ी भाजपा को 2012 के विधानसभा चुनाव में जीत नहीं दिला पाए. चुनाव में भाजपा और खंडूड़ी दोनों की ही हार हुई.

साल 2012 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद स्वतंत्रता सेनानी और मशहूर नेता हेमवती नंदन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने. लेकिन 2014 में उत्तराखंड में आई विनाशकारी आपदा के बाद राहत और पुनर्वास कार्यों को लेकर बहुगुणा की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे. जिस कारण बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद से हटया गया

बहुगुणा के बाद उस दोरान कांग्रेस ने केंद्रीय मंत्री हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया. इसके साथ ही हरीश रावत की जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई. लेकिन कुछ समय बाद ही हरीश रावत के सियासी किले पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा.
सत्ताधारी दल कांग्रेस के 9 विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ 18 मार्च को बगावत का बिगुल फूंक दिया और बीजेपी में शामिल हो गए.
जिसके बाद केंद्र ने हरीश सरकार को अल्पमत की सरकार बताकर यहां राष्ट्रापति शासन लगा दिया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुए फ्लोर टेस्ट में कांग्रेस विजयी हुई और 11 मई 2016 को केंद्र ने राज्य से राष्ट्रपति शासन हटा लिया.
2017 में एक बार फिर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का शंखनाद हुआ. जिसमें बीजेपी ने 57 सीटों के साथ प्रदेश में अपनी सरकार बनाई. वहीं कांग्रेस 11 सीटों पर ही सिमट गई. बीजेपी की इस प्रचंड जीत के बाद संघ से जुड़े हुए बीजेपी नेता त्रिवेंद्र सिंह रावत को उत्तराखंड की कमान सौंपी गई.। ये तो था 18 सालो का राजनीतिक सफर । अब आगे बोलता उतराखंड हर एक पेज को खोल कर आपके सामने लाएगा ।



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