सुन रहा है ना तू…
जिंदगी के दांव के बीच भले ही शेयर बाजार लहुलुहान हो , लेकिन कालाबाजारियों की तिजोरियां तो भाई खूब भर रही हैं।
सुनो अपने पहाड़ मैं मतलब पौड़ी से पिथौरागढ़ तक यह दृश्य इस समय आम है।


जी हा मंडी में सब्जियों के दाम तो  सामान्य हैं, लेकिन सड़कों पर ये खूब सुलगती नजर आ रही हैं। अपने पहाड़ से मैदान  तक यही हाल आटा, दाल और चावल का भी है। जैसे-जैसे कोरोना की दहशत बढ़ी है, आवश्यक वस्तुओं के दाम भी आसमान की ओर खूब उड़ान भर चुके है।

फिर इस बीच त्रिदेव सरकार भी जबरदस्त सचेत हुई और ओवररेटिंग के लिए टॉस्क फोर्स गठित हो गई,
पर जो नज़र आती नही।
गई कहां ये !
आजकल दहशत का व्यापार खूब कमाई कर रहा है। इन हालात में गरीब को नमक-रोटी मिल जाए तो भगवान का शुक्र है, ओर दाल-रोटी मिलना तो 56 भोग से कम नहीं है उनके लिए,
इस बीच ऊपर वाले ने बहुत कुछ बदला भी है..
ट्रेन से लेकर हवाई जहाज तक ठप है। न बस चल रही हैं न कार। जिस आधुनिकता की चकाचौंध के लिए लोग अपनी मिट्टी से दूर सात समंदर पार चले गए, वो आज अप्रासांगिक नजर आ रही है। हजारों श्रमिक पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर दूर पैदल ही अपने घर जाने के लिए सड़क नाप रहे हैं। दृश्य ऐसा मानो 19वीं सदी का भारत हो। पहाड़ों में भी सुदूरवर्ती गांव ऐसे ही हैं, वहां आज भी निकटतम सड़क तक पहुंचने के लिए 20 से 22 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करना पड़ रहा है। लेकिन उनके पास है कुदरत के तोहफे, सेहत के लिए मुफीद आबो-हवा। अपने खेत का जैविक अनाज, फल और सब्जी। जाहिर है उनकी रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता शहर के लोगों से बेहतर है। अब उन्हें लग रहा है कि यदि यही तरक्की की पाठशाला है तो अपना गांव ही अच्छा है।
अपने उत्तराखंड मै जल्दबाजी में सरकार ने
पहले लॉकडाउन में ढील का समय तीन घंटे से बढ़ाकर छह घंटे किया और अब रेस्तरां के किचन खोलने की अनुमति। पता नहीं, किस बात की जल्दबाजी में अपनी सरकार?


ये बात बुद्धिजीवी समझ नहीं पा रहे कि सरकार आखिर साबित क्या करना चाहती है? वह भी उस दौर में जब पूरा देश कोरोना के संक्रमण की आशंका से भयभीत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाथ जोड़कर लोगों से विनती कर रहे हैं कि घरों से बाहर न निकलना। घर की चौखट को लक्ष्मण रेखा मानकर इक्कीस दिन घर पर रहना ..और घर पर ही रहना। विशेषज्ञ कोरोना के संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए इसे जरूरी बता रहे हैं, पर अपनी सरकार है कि एक के बाद एक जोखिम उठा रही है।
सरकार भले ही ये कह रही हो कि जन सहूलियत के लिए ऐसा किया जा रहा है।
‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, अगर ले सको ले लो मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो मेरे बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती और बारिश का पानी।’ कुछ ऐसा ही दृश्य है पहाड़ के गांवों का है
शहरों में कोरोना की दहशत के बीच प्रवासियों ने गांव की ओर रुख शुरू कर दिया है। बड़ी संख्या में दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों से प्रवासी अपने गांव पहुंच गए हैं। सही भी है, मुसीबत के समय अपने गांव अपने घर की चहारदीवारी से ज्यादा सुरक्षित जगह कौन सी होगी!! लेकिन बुरा हो इस कोरोना का, जिसने रिश्तों में दूरी बढ़ा दी। जिन प्रवासियों को आम दिनों में गांव में सब गले लगाते थे तो अब उनके आने से ग्रामीण दूर-दूर हैं। बेबसी है और लाचारी भी, सुरक्षा के लिए सावधानी जरूरी है।
बहराल क्या अब ये नही हो सकता कि बाजार की कालाबाजारी को कागज की जगह धरातल पर रोकने का समय आ गया है।

मैदानी जिलों मैं कोई छूट नही दी जाए पूरा लांक डाऊँन हो ( मूल भूत सुविधाओ को छोड़कर।
पहाड़ के बॉक्सरों मैं काला बाजारी रुक जाए।
आदि
वैसे त्रिवेंद्र सरकार
लगातार प्रयासरत है की ओर बेहतर किया जाए और बेहतर किया जाए। ओर जब प्रयास लगातार होते है तो हालात सुधरते ही है।


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