त्रिवेंद्र ने गैरसैंण मै पहनी चुनोतियों की माला, ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने का पूरा श्रेय अकेले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र को जाता है, इसलिए गैरसैंण को लेकर हर चुनौती का सामना भी उन्हें ही व्यक्तिगत रूप से करना होगा

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उत्तराखंड की राजधानी बोले तो पहाड़ की राजधानी पहाड़ में हो,
इस ओर त्रिवेंद्र ने साहसिक पहला कदम बढ़ा दिया है ओर ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा करके मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने अपनों विरोधियों को भी हैरत में डाल दिया है
हम सभी जानते है कि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया था। विधानसभा भवन बनाकर ओर फिर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने दम दिखाया और अब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राजधानी का आकार ले रहे गैरसैंण के सपने में रंग भर दिए हैं बधाई लेकिन इस बात से इनकार नही किया जा सकता है कि गैरसैंण के ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होने तक की यात्रा के बीच नेतृत्व, संघर्ष और सत्याग्रहों के कई ऐसे पड़ाव रहे, जिनके बगैर न उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आ पाता और न आज राजधानी का ख्वाब हकीकत में बदलता दिखाई देता। राजधानी का यह सपना दशकों पुराना है।
जी हा साठ के दशक में वीरचंद्र सिंह गढ़वाली ने राजधानी के लिए खूब आंदोलन लड़ा। 1989 में खांटी सियासतदां डीडी पंत और विपिन चंद्र त्रिपाठी ने पहाड़ के जनमानस की आंखों में गैरसैंण के सपने को जगाए रखा। अपनी आखिरी सांस तक वे इस सपने को जिंदा रखने के लिए लड़े।

वही आंदोलनकारियों की जिद ने 1994 में तत्कालीन मुलायम सरकार को कौशिक समिति बनाने को मजबूर किया। कौशिक समिति ने गैरसैंण को राजधानी के उपयुक्त पाया। तब से गैरसैंण राज्य आंदोलनकारियों की राजधानी बन गई और इसका नाम चंद्रनगर रख दिया गया।

साल 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में कैबिनेट बैठक की। भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन की नींव रखी। हरीश रावत मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने विधानसभा भवन का निर्माण शुरू कराया। तमाम आलोचनाओं को नजरांदाज करते हुए रावत ने बहुत तेजी से विधानसभा की भव्य इमारत खड़ी की।
ओर विधानसभा में संकल्प लिया कि हर बजट सत्र गैरसैंण में होगा। लेकिन वे गैरसैंण को राजधानी बनाने की घोषणा करने का साहस नहीं दिखा सके।
फिर भाजपा ने अपने चुनावी दृष्टिपत्र में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का वादा शामिल किया।
ओर दो साल तक सरकार गैरसैंण को लेकर बेफिक्र सी दिखी। लेकिन तीसरे साल में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा करके बड़ा सियासी दांव चला है।

वही गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि पिताजी ने सपना देखा, मैंने उसे रूप देने की कोशिश की और आज मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उसमें रंग भर दिए।
ग्रीष्मकालीन राजधानी पर बहुगुणा ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र को शुभकामनाएं दीं। बहुगुणा ने कहा कि इसका यश उनके पिता स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा को जाता है, जिन्होंने अलग पर्वतीय मंत्रालय बनाया।
उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर उस सपने को आकार देने का प्रयास किया और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उसमें रंग भरने का काम किया। उन्होंने कहा कि आज राज्य आंदोलनकारियों का सपना साकार हुआ। प्रदेश सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाकर शहीद आंदोलनकारियों को सच्ची श्रद्धांजलि दी।
लेकिन असल बात ये है कि
गैरसैंण को लेकर असली परीक्षा तो अब है…
9 नवंबर 2000 से लेकर आज यानी 4 मार्च 2020 ही सही, लेकिन गैरसैंण पर उत्तराखंड की राजधानी के नाम पर एक ठप्पा तो लगा ।
हम ग्रीष्मकालीन राजधानी को भी इस ओर एक बड़ा कदम मान सकते हैं और राज्य की जनता इससे कहीं हद तक संतुष्ट भी हो सकती है। लेकिन गैरसैंण ने अब ओर अधिक सवालों को जन्म भी दे दिया है और इसके साथ चुनौतियां भी उतनी ही पैदा हो चुकी हैं।
ओर इन चुनौतियों को त्रिंवेंद्र सिंह रावत ने खुद के लिए ही खड़ा किया है और इसे सकारात्मक रूप में देखा जाना चाहिए। ये हम कह सकते है ।
फिलहाल तो गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने का पूरा श्रेय अकेले मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को जाता दिखाई देता है, इसलिए गैरसैंण को लेकर हर चुनौती का सामना भी उन्हें ही व्यक्तिगत रूप से करना होगा, क्योंकि अभी उनके वर्तमान शासनकाल के दो साल शेष हैं। इन दो सालों में गैरसैंण को लेकर बहुत कुछ करके जनता के सामने रखना होगा ताकि गैरसैंण के नाम पर हमेशा ठगा महसूस करने वाली जनता का भरोसा सच में जीता जा सके और फिर 2022 का रण खुलकर लड़ा जा सके।
चुनोतियो की बात करे तो
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के सामने सबसे पहली चुनौती ये है कि क्या गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी के तौर पर तैयार हो चुका है जिसके बारे में वे घोषणा से पहले कहते रहे हैं?
क्या सच में वहां वो सारा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया गया है जो एक राजधानी के लिए होना चाहिए? अगर नहीं, तो ये काम कब तक हो जाएगा?

गैरसैंण में किस स्तर के अधिकारियों को बैठाया जाना है? क्या वहां कुछ ब्यूरोक्रेट्स नियमित तौर पर बैठेंगे या आंशिक तौर पर? यह तय करके भी पारदर्शी तरीके से जनता को बताया जाना आवश्यक है।

मंत्रियों और विधायकों का गैरसैंण को लेकर क्या शेड्यूल निश्चित किया गया है अथवा किया जाना प्रस्तावित है? खुद मुख्यमंत्री महीने में कितने दिन या कब गैरसैंण में बैठेंगे?
गैरसैंण में अधिकारियों, विधायकों, मंत्रियों और मुख्यमंत्री का जनता मिलन शेड्यूल क्या होगा?

ये तमाम वो सवाल हैं जो गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने की घोषणा के साथ ही उपज चुके हैं। इनके जवाब तो मुख्यमंत्री को तुरंत तलाशकर सामने रखने होंगे।बाकी सबकुछ इसके बाद है।

वही ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा के तुरंत बाद उत्तराखंडवासी कांग्रेसी दिग्गज हरीश रावत की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया के जरिए सबसे पहले सामने आई। उन्होंने मौके पर चौका मारने की कोशिश की और कह डाला कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की घोषणा करेंगे। लेकिन वे शायद ये भूल गए कि उनके पास भी तो मौका था। तब उन्होंने छक्का क्यों नहीं मार डाला? विपक्ष के नेता भले ही छोटे से राज्य की दो दो राजधानियों की मुखालफत कर रहे हैं, लेकिन उन्हें ये जरूर मंथन करना चाहिए कि उनके दल की सरकार ने गैरसैंण के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जिससे जनता उन पर भरोसा करे।

त्रिवेंद्र सिंह रावत की घोषणा पर विपक्ष का खिसियाना स्वाभाविक है। क्योंकि 2022 से ऐन पहले राज्य के सबसे बड़े जनभावनात्मक मुद्दे का क्रेडिट बीजेपी ने ले लिया है। अब भले ही विपक्ष चिल्लाता रहे कि वो सत्ता में आने पर गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाएगा, तो उसकी बात पर भरोसा वर्तमान हालात में भला कौन करेगा?
तो वही राज्य आंदोलनकारी गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा से पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हैं। तमाम आंदोलनकारियों ने फेसबुक पर इसका इजहार किया है। लेकिन आंशिक संतुष्टि उन्हें मिली लगती है। कुछ आंदोलनकारियों ने गैरसैंण के नाम पर आयोजित जश्नों में भी हिस्सा लिया है।

कुछ भी हो, गैरसैंण से संबंधित घोषणा एक उम्मीद की किरण है। इससे पहाड़ की ओर एक कदम तो बढ़ा है। इसे स्थाई राजधानी की एक नींव के रूप में भी देखा जा सकता है और उम्मीद की जा सकती है कि इस नींव को जल्दी मजबूत करने का काम त्रिवेंद्र सिंह रावत कर दिखाएंगे।
पर क्या इसका रिजल्ट उन्हें 2022 की पूरक परीक्षा में मिलेगा। ये देखना दिलचस्प होगा क्योंकि अभी पिक्चर पूरी बाकी है।


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