हरीश रावत के बयान से फिर मची सियासी खलबली, वायरल हो रही है निज़ाम को जल्द बदलने की ख़बर! आखिर क्या है सच .. .

आजकल उत्तराखंड की सियायत मैं हलचल तेज़ है कि जहा जहा जिन राज्यों मै भाजपा की सरकारे है
ओर जहां 2022 मै विधानसभा के चुनाव होने है ओर भाजपा हाईकमाम को जहा लग रहा है कि हम इस राज्य की सत्ता मैं 2022 मैं नही आ सकते और अगर आना है तो मुख्यमंत्री का चेहरा वहां बदलना होगा इस तरह की खबरे उत्तराखंड मैं भी सुनाई दे रही है

उनका अब तर्क जान ले  ।
इन खबरों के भी जो चर्चाओं मैं है और वायरल हो रहा है
भाजपा के हाथ से कई राज्यों के निकलने के बाद दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी भारतीय जनता पार्टी के लिये बुरी ख़बर लाया
इससे पहले भाजपा के हाथों से झारखण्ड राज्य भी निकला
अब चर्चा ये है कि दिल्ली में करारी हार के बाद भाजपा संगठन और भाजपा शासित राज्यों में भारी फेरबदल की संभावनाएं प्रबल हो गयी हैं ये कहा जाने लगा है
जिसकी वजह से राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक हो सकती है
उन राज्यों मैं जहां पार्टी सिर्फ अकेले अपने दम पर सत्ता मे आई यानी सिर्फ मोदी जी के नाम पर

अब जरा यहा नज़र डालें

मार्च 2018 में भाजपा अपने दम पर देश भर के 13 राज्यों में सत्ता में थी, जबकि वह अन्य दलों के साथ गठबंधन में छह अन्य राज्यों पर शासन कर रही थी, लेकिन हाल ही में झारखण्ड में चुनाव हारने के बाद भाजपा अब अपने दम पर आठ राज्यों पर शासन कर रही है, और इतने ही अन्य राज्यों में वह सत्तारूढ़ गठबंधन के सहारे या गठनबंधन के सहयोगियों के साथ सत्ता में है, जबकि मार्च 2018 में देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र में भाजपा अकेले या साझेदारी में सत्ता में थी, जो कि घट कर 34 प्रतिशत रह गया है।
भाजपा देश के कुल 16 राज्यों में से बिहार, मेघालय, मिजोरम, नागालैण्ड और सिक्किम में सहयोगियों की सरकार में शामिल है।
देखा जाय तो वह 5 राज्यों में अपने दम पर तथा 11 में सहयोगियों के साथ सत्ता में है, जबकि भाजपा जिस कांग्रेस से भारत के मुक्त हो जाने का नारा लगा रही थी। वही कांग्रेस 5 राज्यों में सत्ता में आ गयी है और इन राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और पंजाब जैसे राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और बड़े राज्य भी शामिल हैं।
यहां तक कि महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य की सत्ता में भी कांग्रेस साझेदार हो गयी है। अगर इसी तरह एक के बाद एक राज्य भाजपा के हाथ से खिसकता रहेगा और आगे दिल्ली की तरह उसकी उम्मीदों पर पानी फिरता रहेगा तो ये गम्भीर मंथन करने का समय है
ओर जब राज्य लगातार हाथ से निकलते रहेगे तो
राज्यसभा में भाजपा अपने दम पर बहुमत जुटाने का सपना कैसे पूरा करेगी ।
ऐसे मैं ख़बर वायरल है कि दिल्ली चुनाव के नतीजों की मार भाजपा के वर्तमान कुछ अलोकप्रिय मुख्यमंत्रियों और उप मुख्यमंत्रियों पर पड़ने जा रही है।
जिनमे पांच राज्य रडार पर माने जा रहे हैं।
चर्चा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय भी भाजपा के मुख्यमंत्रियों के कामकाज की समीक्षा निरन्तर कर रहा है।
भाजपा के राजनीतिक क्षरण की शुरुआत राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में हार के साथ ही शुरू हो गयी थी। हालांकि भाजपा राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस से काफी कम अंतर से पिछड़ी थी मगर छत्तीसगढ़ में उसे कांग्रेस के आगे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में तथा लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखण्ड में स्थानीय नेतृत्व की अलोकप्रियता पार्टी पर भारी पड़ी। झारखण्ड और हरियाणा में लोकसभा चुनाव की तुलना में विधानसभा में 18 और 22 प्रतिशत वोट घट गये। दिल्ली में पूर्वांचलियों के वोट के लालच में प्रदेश अध्यक्ष बनाये गये मनोज तिवारी भी गायक के रूप में अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक मोर्चे पर नहीं भुना पाये।

वर्तमान में अकेला बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश भाजपा के हाथ में हैं और कर्नाटक में बड़ी मुश्किल से सत्ता वापस लौटी है। हरियाणा में सत्ता बचाने के लिये दुष्यन्त चैटाला की जन नायक जनता पार्टी की बैशाखी का सहारा लेना पड़ा है। बिहार, मेघालय, मीजोरम, नागालैण्ड और सिक्किम में दूसरे दलों के मुख्यमंत्रियों की छत्रछाया में भाजपा की राजनीति चल रही है। इसलिये आने वाला समय भाजपा के लिये काफी चुनौतियों भरा हो सकता है।


ये सब खबरे उत्तराखंड मैं चल ही रही थी की तभी
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने फेसबुक पेज पर जब से ये लिखा कि उत्तराखंड में अस्थिरता आ सकती
जो लिखा ठीक उसको हम वैसे ही रख रहे है हरीश रावत लिखते है कि
#दिल्ली के चुनाव और #उत्तराखंड में मची हलचल, एक बात का स्पष्ट संकेत दे रही है कि, उत्तराखण्ड फिर राजनैतिक अस्थिरता की तरफ जा रहा है। #BJP, उत्तराखण्ड में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने के लिए अपराधिक स्तर तक दोषी है। राज्य के जन्म के साथ ही, #भाजपा ने उत्तराखण्ड में अस्थिरता को जन्म दिया। ऐसा लगता है, अस्थिरता की लत भाजपा को इतनी गहरी लग चुकी है कि, वो छूटे नहीं छूट रही है।


हरीश रावत के इस बयान के बाद सियायत मैं भूचाल आ गया है ओर उत्तराखंड की फिज़ाओं में ये हवा भी फिर से तैरने लगी कि सूबे में निज़ाम बदला जाने वाला है। नए निज़ाम का नाम को लेकर कुछ नाम भी चर्चाओं में खूब है।


लेकिन यहां कुछ सवाल सोशल मीडिया मैं भी वायरल हो रहे है
की आखिर उत्तराखंड मै अगर भाजपा निजाम को बदले जाने का मन बना रही है तो कारण क्या
हो सकते है ?

सवाल नंबर 1- क्या निजाम पर अब तक कोई आरोप लगा है?
सवाल नंबर 2- क्या निजाम की परफॉर्मेंस कहीं कमतर रही है?
सवाल नंबर 3- क्या निजाम के कार्यकाल के दौरान बीजेपी कोई चुनाव हारी है?
इन तीनों सवालों के जवाब जनता भी दे सकती है।
पंचायत चुनाव, निकाय चुनाव, विधानसभा उपचुनाव और यहां तक कि लोकसभा चुनाव में प्रदेश में बीजेपी को बंपर जीत मिली। निजाम साहब पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप अब तक नहीं लगा है।
उनकी परफॉर्मेंस पर हाईकमान की तरफ से अब तक कोई सवाल नहीं उठे। हां, उनके सियासी विरोधी तो उनकी परफॉर्मेंस पर सैकड़ों और हज़ारों सवाल भी खड़े कर सकते हैं। लेकिन इसको तो सियासी विरोध के तौर पर ही देखा जाएगा ना?
अपने उत्तराखंड
में दो साल बाद चुनाव होने हैं। अब ऐसे में बीजेपी को निजाम बदलना खुद के लिए क्या भारी नही पड़ सकता है ये सवाल भी जन्म ले चुका है ।
उत्तराखंड मे बीजेपी निज़ाम बदलती आई है मतलब ऐसा करती ही रही है लेकिन कहा जा रहा है कबतब कारण कुछ और थे। या तो उसके निजाम पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, या फिर उसने अपनी छवि के लिए निजाम बदला था। लेकिन नतीजा उसके पक्ष में कभी नहीं रहा। इस बार राज्य में बीजेपी को हराने का दम रखने वाला दूसरा राजनीतिक दल कांग्रेस आपसी कलह मैं उलझा हुवा है
ओर वैसे भी राज्य में बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही मुकाबला होता रहा है। लेकिन इस बार तो कांग्रेस भी चारों खाने चित है दिल्ली का परिणाम आपके सामने है कुछ लोगो का कहना है कि
जब सारे समीकरण भाजपा और मौजूदा निजाम के पक्ष में हैं तो निजाम को बदलने की हवाई खबर निश्चितत: उनके सियासी विरोधियों की सोशल मीडिया पर उड़ाई लगती है। ये भी कहा जा रहा है।

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