‘‘घी-संक्रान्त’’


उत्तराखण्ड का एक और अनोखा व अनूठा त्यौहार ‘‘घी संक्रान्त’’। कहा जाता है कि, यह त्यौहार घी, दूध अर्थात ‘‘ढिनाई’’ को समर्पित है। खूब लजीज व्यंजन बनते हैं। दाड़ीम (छोटा अनार), अखरोट, गुड़ में घी मिलाकर प्रसाद दिया जाता है। अद्भूत स्वादिष्ट होता है, यह प्रसाद। घर की महिला पहले अपने मांथे पर फिर गाय, भैंस व बैलों के सिंग व मांथे पर घी का टीका लगाती हैं व सिंग चमकाती हैं। बच्चों व बड़ों, सबके मांथे पर घी चपोड़ा जाता है। हरेला के बाद रक्षाबन्धन फिर घी संक्रान्त, फिर जन्माष्टमी सब प्रकृति की रक्षा के त्यौहार हैं। बरसात के मौसम में खूब हरियाली रहती है, सारे गाॅव, सारी धरती, हरित चादर सी ओड़ लेती है। किसानों को फल, सब्जी व अनाज तो उनके जानवरों को खूब हरा-हरा चारा मिलता है। ‘‘घी संक्रान्त’’ हरित धरती के अन्नपूर्णा स्वरूप का पूजन है। हरेले के ठीक एक माह बाद मनाया जाता है, ‘‘घी संक्रान्त’’ का त्यौहार। हरेला पाॅच वर्ष पहले तक राज्य के कुंमाऊ अंचल व चमोली जिले में मनाया जाता था। अब राज्य पर्व के रूप में सारे उत्तराखण्ड में मनाया जाता है। मैंने इस पर्व के अध्यात्मिक व सांस्कृतिक पहलू को उभारने का प्रयास किया था। मुझे डर था कहीं सरकारी तंत्र इसे वृक्षारोपण पर्व मात्र न बना दें। खूब वृक्ष रोपें, वृक्ष धरती का श्रंगार है, संस्कृति धरती की आभा है तथा आध्यात्मिकता धरती की खुशबू है। धरती के श्रंगार के साथ संस्कृति व त्यौहारों से जुड़ी आध्यात्मिकता का महत्व बना रहना चाहिये। परम्परायें हमें जोड़ती हैं, हर क्षेत्र के त्यौहार, इन्हीं सामुहिक परम्पराओं का आभास कराती हैं। मुझे अपने बचपन के कई गुद-गुदाने वाले प्रसंग आज भी याद हैं। इन प्रसंगों में अधिकांश हमारे त्यौहारों से जुड़े हैं। ‘‘घी संक्रान्त’’ के दिन मेरे नैनीहाल से खूब दाड़ीम (छोटा अनार) हमारे घर आ जाते थे। मेरे नैनीहाल के देवता का मंदिर अर्थात सैमज्यू का मंदिर, हमारे गाॅव के रास्ते में है। ‘‘घी संक्रान्त’’ के दिन, मेरे मामा जी लोगों के सभी परिवार अपनी-2 पूजा लेकर, सैमज्यू के मन्दिर में आते थे। मैं यह सब इसलिये कह रहा हॅू, क्योंकि अब यह परम्परा मात्र औपचारिकता रह गई है। सभी मामा लोग अपनी-2 पूजा में दाड़ीम, केला, अखरोट, ककड़ी खूब सारा घी, गुड़, दही लाते थे। पूजा के बाद सभी थोड़ा-2 एक तिमले के पत्ते में मुझे देते थे। मैं वहां का प्रसाद खाकर, एक किलोमीटर चढ़ाई चढ़कर गाॅव आ जाता था और गाॅव की पूजा का भी प्रसाद पा जाता था। उस समय भोला बचपन केवल स्वाद जानता था। मान-सम्मान का तो उस समय बोध ही नहीं था। समर्थ-असमर्थ सभी के घर चासनी में पूरी व रायता तो बनता ही था। चाहे जंगल से तोड़कर लायें, दाड़ीम-गुड़ का प्रसाद बंटता ही था। इस दिन गाॅव भर में परस्पर संक्रान्त बांटते थे। त्यौहार का दिन सब मिल बांटकर मनाते थे। अब सब धीरे-2 धुंधला रहा है। ग्रामणियत धीरे-2 तिरोहित हो रही है।
बड़ी श्रेष्ठ थी, हमारी परम्परायें व त्यौहारों की सामुहिकता। भौतिक तरक्की ने आध्यात्म से हमारा संबन्ध तोड़ दिया है। उत्तराखण्ड के अधिकांश त्यौहार प्रकृति से जुड़े हैं। यूं तो समस्त ग्रामीण भारत के त्यौहार प्रकृति बोधक हैं। असम के वीहू के तो रंग और नाम ही मौसम के अनुरूप है। हमारे उत्तराखण्ड में हरेला, घी संक्रान्त, चैतोला, छम्मा देही-फूल देई, उत्तरायणी का गुड़ त्यौहार प्रकृति बोधक हैं। उत्तरायणी को सूर्य, सूर्य के अराध्य शिव का पूजन श्रावण में हरेला के साथ शिव हरेला के रूप में, बसन्त का आगाज फूल देही-छम्मा देई के फूलों से घर द्वार की पूजा की जाती है। चैत, बैसाख के आते ही अपने आप पांव देवी भूमियां या धन्याल देवता के मन्दिर की ओर बढ़ने लगते हैं। खोल दे माता, खोल दे भवानी-धारमां केवाड़ा के मनोहारी बोलों से सारा गाॅंव गूंजने लगता है। देवी हों या भूमियाॅं का मन्दिर, बहुधा गाॅव के धार अर्थात ऊंचे स्थान पर होते हैं। पूरा गाॅव गुड़ की भेली लेकर झोड़े (झुमैलो) गाते हुये मन्दिरों की परिक्रमा को चल पड़ते हैं। आज भी कई गाॅवों में यह परम्परा है। बसन्त पंचमी का त्यौहार चैतोले के रूप में गाॅव-2 में मनाया जाता था। एक अनूठी व प्यार मई परम्परा है चैतोला। विवाहिता बेटी के पास नये आनाज (गेहूॅं) के लघड(पुरियां)  पुवे (पूरी प्रसाद) व नये वस्त्र भेजने की। आज भी विवाहिता बेटी इस रश्म का इंतजार करती है। रक्षाबन्धन के त्यौहार की तरह, भाई के प्रेम रस का त्यौहार है, यह चैतोला। मेरे मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान जिस तरह ग्राम हरेला प्रतियोगितायें चलाई गई, उस तर्ज पर चैतोले में मायके आयी बेटी को एक साड़ी व पाॅच सौ रूपये का टीका देने की परम्परा भी सरकार की ओर से प्रारम्भ की गई थी। राज्य का सांस्कृतिक विभाग इस कार्यक्रम का संचालन करता था। शायद यह योजना रोक दी गई है। ग्रामीण जन-जीवन में रस घोलने हेतु इस प्रकार की योजनायें आवश्यक हैं। हमें गाॅंव में लोगों को रोकने के लिए ग्रामिणियत पुनः जागृत करना पड़ेगा।
ग्रामीण उत्तराखण्ड आज भी अपनी गहरी विविधता पूर्ण संास्कृतिक विरासत को संजोये हुये है। इन सांस्कृतिक परम्पराओं का हमारे मन-मस्तिष्क में गहरा असर है। आज दिल्ली एन.सी.आर. क्षेत्र को देखिये, आपको सौ से अधिक छोटे-बड़े उत्तराखण्ड अपनी सांस्कृतिक पहचान की ध्वजा ऊपर उठाये हुये दिखाई देंगे। हमारे पास भोजपुरी भाषा आधारित सांस्कृतिक मण्डलियों के बाद, सार्वाधिक लोकगीत, लोक संगीत मंच व गायक, गढ़वाली व कुमाऊॅंनी, जौनसारी तथा रंग भाषा आधारित हैं। मुझे खुशी है, हमारे मध्य आज कई ऐसे लोकगायक व लोकगायिकायें हैं, जो सभी उत्तराखण्डी भाषाओं के गीत-संगीत को पूर्ण सिद्वहस्तता से आगे बढ़ा रहे हैं या बढ़ा रही हैं। अब जुबीन नौटियाल व राजन के उद्भव के बाद, हमारी कला संस्कृति का क्षेत्र और विविधतापूर्ण होता जा रहा है। त्यौहार हमारे गहरे सांस्कृतिक परिवेश के परिचय स्तम्भ हैं। कुछ त्यौहार सार्वभौम हैं, जैसे दीवाली, होली, शिवरात्रि, जन्माष्टमी आदि-2। कुछ विशुद्ध क्षेत्रीय हैं, हरेला, चैतोला, घी संक्रान्त, घुघुतिया त्यौहार, बंधाण पूजा, फूल देई आदि। हमारे त्यौहार प्रकृति से हमारे गहरे रिश्ते के द्योतक हैं। इसे बनाये रखने का दायित्व आज हमारी पीढ़ी का है। हम अपने त्यौहारों को व्यापकता दे सकें इसका निरन्तर प्रयास करना चाहिये। हमारे त्यौहारों को एक सार्वभौंम पहचान का आज भी इन्तजार है। भोजपुर की छट या पंजाब की लोहड़ी आज राष्ट्रीय त्यौहार का रूप लेते जा रहे हैं। सार्वभौंम पहचान की यही स्थिति, वीहू या औणम् या गरबा की है। परन्तु इस प्रकार की सार्वभांैमिकता हमारे त्यौहारों को वंचित किये हुये है। मैंने गहरे मंथन के बाद हरेला त्यौहार में तुलनात्मक रूप से अधिक संभावना देखी। आज हरेला, उत्तराखण्ड का राज्य पर्व (त्यौहार) का स्थान ले चुका है। राज्य में भी इसके फैलाव को और बढ़ाने व गहराई देने की आवश्यकता है। औणम, गरबा, लोहड़ी, वीहू में सम्बद्ध क्षेत्रों के बेटे-बेटियां कहीं की हों, अपने गाॅव आते हैं। हमारे मामले में ऐसा नहीं है। हम एक पट्टी परगना का नामकरण हरियाली पट्टी कर सकते हैं। हरियाली देवी का मन्दिर भी बना सकते हैं, जैसा गोचर क्षेत्र में है। मगर इस दिन-दिवस अपने गाॅव नहीं पहुच  सकते हैं। अपने त्यौहार व संस्कृति का अनुशरण संकीर्णतायें नहीं हैं, एक सांस्कृतिक रूप से अद्भूत विविधतापूर्ण भारत की पहचान का सम्मान है। जब सब क्षेत्र अपनी-2 पहचानों को सहेजेंगे तभी तो एक विविधतापूर्ण भारत बनेगा। मेरा प्रयास है, अब हम दिल्ली में भी हरेला महोत्सव मनायें, सार्वजनिक रूप से मनायें। मैं अब उत्तराखण्ड की तर्ज पर दिल्ली में हरेला महोत्सव व हरेला प्रतियोगिता आयोजित करने की योजना पर काम कर रहा हॅू। मैंने एक ऐसा प्रयास पिछले वर्ष घी-संक्रान्त के अवसर पर दिल्ली में किया था, जो बहुत सफल हुआ। मैं इस वर्ष पुनः ऐसा आयोजन करना चाह रहा था, मगर स्थान के अभाव में मुझे विचार त्यागना पड़ा। पिछले वर्ष मुझे तत्कालिक राज्यसभा सांसद, श्री महेन्द्र सिंह माहरा जी के आवास का प्रांगण त्यौहार मनाने के लिए उपलब्ध हो गया था। इस बार कोई बड़ा स्थान नहीं मिल पाया।
उत्तराखण्ड, व्यंजन  की विविधता के दृष्टिकोण से अद्भुत रूप से समृद्ध है। ‘‘घी संक्रान्त’’ है क्या, हमारे पूर्वजों ने कब से इस प्रथा को सामुहिक नाम दिया, ‘‘घी संक्रान्त’’। मैं अभी तक इसके उद्भव का छोर नहीं ढूंढ पाया हूॅू, प्रयास जारी है। पूराने गढ़वाल व कुमाऊॅं में यह त्यौहार अत्यधिक उत्सुकता व उद्भवता से मनाया जाता है। प्रकृति के साथ पशु पूजन भी इसका हिस्सा था। इस दिन आम तौर पर बैल, गाय व भैंस के सिंगों व मांथे पर घी का लेपन कर उनके मांथे को चमकाया जाता है। अब पशु हैं ही नहीं या नाम मात्र के रह गये हैं। हम गौ भक्ति की बात करते हैं। मगर गौ वंश धीरे-2 विलुप्त हो रहा है। इसलिये अब बधांण देवता का भी पूजन नहीं हो रहा है। बधांण देवता के मंदिर अब अतीत की चर्चा में हैं। मैंने इसी गौवंश के संर्वधन व प्रसार हेतु चम्पावत के नरियाल गाॅव में पहाड़ी गाय की नश्ल सुधार कर, तुलनात्मकता में अधिक मात्रा में दूध देने वाले गायं  तैयार करवाई। मुुझे उम्मीद है, मेरी विदाई के बाद, इस प्रोजेक्ट की विदाई नहीं हुई होगी। इस पर यथावत काम चल रहा होगा।
चर्चा ‘‘घी संक्रान्त’’ के पकवानों की भी होना चाहिये। यह त्यौहार हमारी महिलाओं की उच्च गुणात्मक पौष्टिक व्यंजन तैयार करने की क्षमता का द्योतक है। मुझे उत्तराखण्ड के सभी क्षेत्रों के पकवानों का रसास्वादन का सौभाग्य मिला है। मैंने सण्डे पोस्ट में कुछ समय पूर्व प्रकाशित दो लेखों में झोंगरे की खीर व हरेला शीर्षक के तहत् इन विविधतापूर्ण पकवानों का उल्लेख किया है। मैं जानता हॅू, आज अधिकांश उत्तराखण्डी घरों में एकाध उत्तराखण्डी व्यंजन जरूर बनने लगा है। मुझे मेरे कई गैर उत्तराखण्डी दोस्त बताते हैं कि, आज उन्होंने फलां-2 अपने दोस्त के घर पर अमुक-2 पकवान खाया। अर्सा अब बहुत चर्चा में है। मडुवे, झोंगरे, गहत तथा भट्ट को विश्व खाद्य संगठन द्वारा पौष्टिक आहार घोषित करने के बाद इनके पकवानों व इनमें प्राप्त पौष्टिक तत्वों को लेकर गैर उत्तराखण्डी लोगों में बड़ी उत्सुकता है। हमें इस उत्सुकता को अवसर मानकर फायदा उठाना चाहिये। सरकार व सामाजिक कार्यकर्ता, होटल इन्डस्ट्रीज यदि प्रयास करें तो, हमारे कुछ पकवानों को सार्वभौम स्वीकार्यता मिल सकती है। यह एक झटके में नहीं होगा, निरन्तर कोशिशें रंग ला सकती हैं। मैंने मुख्यमंत्री के तौर पर जब ‘‘घी संक्रान्त’’ के पर्व को उत्तराखण्डी व्यंजन फैस्टेबल का स्वरूप दिया तो, मुझे बहुत सपोर्ट मिला। ‘धाद’ नामक एक सामाजिक संस्था आज भी उत्तराखण्डी व्यंजन, संक्रान्त अर्थात घी संक्रान्त का झण्डा उठाये हुये है। मेरे मुख्यमंत्री कार्यकाल में प्रत्येक जिले में ऐसे सार्वजनिक आयोजन किये गये। नैनीताल व टिहरी के ऐसे आयोजन में कुछ विख्यात सैफ भी आये थे और उन्होंने इस स्थानीय व्यंजन प्रतियोगिता व इसमें परोसे गये व्यंजनों को खूब सराहा। मैंने सरकारी दावतों में उत्तराखण्डी व्यंजन परोसना अनिवार्य कर दिया था। राजभवन में भी इस परम्परा को अपनाया गया। राष्ट्रपति भवन के मीनू में अब झौंगरे की खीर भी सम्मिलित है। इन्द्रमाॅं कैन्टीनें तो उत्तराखण्डी व्यंजनों व पौष्टिकता की प्रतीक बन गई थी। शायद यह शिल शिला कुछ ढीला पड़ गया है। पिछले चार-पाॅच वर्षों में हमने अपनी रसोई के अद्भूत व्यंजनों को, सार्वजनिक स्वीकार्यता देने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया है। शादी-व्याह में उत्तराखण्डी रसोई के पकवान गर्व पूर्वक परोसे जाने लगे हैं। कई कैटरर्स ने अपनी खासियतों में उत्तराखण्डी पकवान बताना भी शुरू कर दिया है। देहरादून में कई उत्तराखण्डी व्यंजनों के रेस्टोरेन्ट दिखाई दे रहे हैं। मैंने कई जगह सड़क के किनारे भी उत्तराखण्डी व्यंजनों वाले ढाबों को अच्छे पैंसे कमाते हुये देखा है। अब लोग अल्मोड़े वाली बाल मिठाई की तर्ज पर अर्सा भी पैक कर बेच रहे हैं।


इटली-डोसा-सांभर, ढोकला, छोले-भटूरे, कुल्छे भी एक दिन या एक साल में करोड़ों लोगों की पसन्द नहीं बन गये। अलग-2 क्षेत्रों की ये विशेषतायें उन क्षेत्रों की रसोई से, करोड़ों रसोईयों या खाने व नास्ते के टेबल पर पहुंची। इस पुनित कार्य में उन क्षेत्रों के लाखों महिला-पुरूषों का अभूतपूर्व योगदान रहा है। मुझे विश्वास है, हम थोेड़ा प्रयास और करें तो, हमारे कई पकवान अगले दस वर्षों में करोड़ों भारतीयों की नास्ते या डिनर की टेबल की शोभा बढ़ा रहे होंगे, फिर हमारे पकवानों के साथ जैविकता का बोध जुड़ा हुआ है। प्रकृति व आध्यात्म का पुट हमारी झौंगरे की खीर व रामदाने के लड्डुओं को भगवान बालाजी व भगवान जगन्नाथ की रसोई तक पहुंचा सकते हैं। देव धरती के व्यंजन को कौन नहीं चखना चाहेगा। भगवान भी देव भूमि के अन्न के पकवानों का भोग लगाना चाहेंगे। मुझे यह कहते हुये अच्छा लग रहा है, इस वर्ष सैकड़ों उत्तराखण्डी सैफ जो बाहर के देशों में नाम कमा रहे हैं, दिल्ली में उत्तराखण्डी व्यंजनों पर चर्चा
के लिये जुट रहे हैं। हमें हिमालयी काॅनक्लेव के साथ हिमालयी सैफ काॅनक्लेव की आवश्यकता है। उत्तराखण्ड में ‘‘घी संक्रान्त’’ के अवसर को व्यंजन प्रतियोगिता का रूप देना चाहिये। प्रत्येक घर सार्वजनिक रूप से अपने पकवानों को आगे लायें। जरा कल्पना करिये न जाने कितने दर्जनों प्रकार की चटनियां ही इस प्रतियोगिता पर चार चाॅंद लगा देंगी। हमारी महिलाओं के हस्तलाघव में दैवीय गुण है। गरीब अन्नपूर्णायें अपने पकवानों की खासियतों से सबको मुग्ध कर सकती हैं। आओ संकल्प लें, अगली ‘‘घी संक्रान्त’’ अपने परिवार के साथ गाॅंव में मनायें, सार्वजनिक रूप से मनायें।
जय घी संक्रान्त।
(हरीश रावत)।



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