कुछ तीखे सवाल : पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत लिखते है

 

देश की अर्थव्यस्था के सम्मुख कुछ तीखे सवाल हैं। सबसे तीखा सवाल है, बढ़ती हुई बेरोजगारी वृद्धि दर का समाधान क्या है। काफी ना-नुकर के बाद केन्द्र सरकार ने इस तथ्य को मान लिया है कि, देश में इस समय न केवल सर्वाधिक बेरोजगारी है, बल्कि उसकी वार्षिक वृद्धि दर 45 वर्षों में सर्वाधिक है, छः दशमलव एक (6.1) प्रतिशत। यह आंकड़ा भारत सरकार के सांख्यिकीय विभाग के अध्ययन में आया है। कुछ स्वतंत्र संस्थाओें जैसे सेन्टर फाॅर माॅनिटरिंग इण्डियन इकोनोमी ने बेरोजगारी वृद्धि दर को साढे़ सात प्रतिशत से ऊपर बताया है। एन0एस0एस0ओ0 की सर्वे के अनुसार पिछले दो वर्षों में एक करोड़ दस लाख नौकरियां छूटी हैं। इनमें सर्वाधिक संख्या अर्थात अठासी लाख नौकरियां महिलाओं की छूटी हैं। सेंटर फाॅर मानिटरिंग इण्डियन इकोनोमी के अनुसार साढ़े सात प्रतिशत की बेरोजगारी दर में महिलाओं की बेरोजगारी दर साढ़े पन्द्रह प्रतिशत तथा पुरूषों में साढ़े पाॅच प्रतिशत है। बढ़ती बेरोजगारी से महिलाओं में आर्थिक असुरक्षा और बढ़ी है। एक चिंताजनक समाचार आटो मोबाईल सैक्टर से आ रहा है, जहां मंदी के चलते कंपोनेंट उद्योग को दस लाख नौकरियां कम करनी पड़ रही हैं। एक समय था जब इंजीनियरिंग संस्थानों को खोलने की होड़ लगी हुई थी। आज स्थिति यह है कि, हर वर्ष सैकड़ों की संख्या में इंजीनियरिंग काॅलेज, पाॅलीटेक्निक व आई0टी0आई0 बंद हो रहे हैं। जो संस्थान चल रहे हैं उनके क्षमता से आधी संख्या में भी छात्र नहीं मिल रहे हैं। स्किल्ड मेन पाॅवर मार्केट में आज मांग बहुत घट गई हैं। स्थिति की गम्भीरता का आंकलन अभी-2 मानव संसाधन मंत्री द्वारा संसद में दिये गये व्यकतब्य से लगाया जा सकता है। उन्होंने सदन के पटल पर माना है कि, इंजीनियरिंग संस्थानों में पास हो रहे छात्रों की आधे से अधिक संख्या को काम नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने संसद को बताया, सात लाख त्रियानब्बे हजार उतीर्ण छात्रों में से केवल तीन लाख उन्नसठ हजार छात्रों को काम मिला है। आई0आई0टीज व एन0आई0टीज के केवल 23 प्रतिशत छात्रों को कैम्पस प्लेसमेंट मिला है। स्थिति यह है कि, भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद अब इन संस्थानों को कई विषयों में पाठ्यक्रम संचालन की अनुमति नहीं दे रहा है। सन् 2011-12 में कैम्पस प्लेसमेंट 90 प्रतिशत से अधिक था।
मानव संसाधन मंत्री महोदय का व्यकतब्य इस तथ्य का धौतक है कि, हमारी अर्थव्यवस्था में निरन्तर गिरावट आ रही है। यह स्थिति जाॅब लैस ग्राथ से अधिक चितांजनक है। बिना नये संसाधन जुटाये व लोगों की खरीद क्षमता में वृद्धि किये सात प्रतिशत की जी0डी0पी0 दर बनाये रखना कठिन होगा। इस समय विकास दर हाॅंफ रही है। मैं इस लेख में इस प्रश्न पर नहीं उलझूंगा कि विकास दर 7 प्रतिशत है या साढ़े पाॅंच प्रतिशत। मगर इस तथ्य को हम सब स्वीकारेंगे कि, वर्तमान विकास दर से अर्थव्यवस्था में उत्साह पैदा नहीं हो रहा है और न रोजगार पैदा हो रहे हैं। इस समय हमारी अर्थव्यवस्था आवश्यकता व परिस्थितियों के मध्य झूल रही है। मोदी जी भरोसे की लम्बी लकीर खिंचते हैं, उन्होंने वर्ष 2024 तक पाॅंच ट्रिलियन डाॅलर्स की अर्थव्यवस्था का नारा उछाला है। मध्यम वर्ग अपने सपनों के राजकुमार के वादे से मुग्ध है। संघीय राष्ट्र में जी0डी0पी0 राज्यों के विकास का योग है, इसमें कुछ संघीय परिसम्पत्तिया योगदान करती हैं। भारत में महाराष्ट्र व गुजरात जैसे कुछ ही राज्य हैं, जहां अच्छे नीतिगत सहयोग से उन राज्यों की जी0डी0पी0 को दुगना किया जा सकता है। क्या इन कुछ राज्यों में ऐसी क्षमता है कि, ये राज्य उत्तर प्रदेश, विहार, झारखण्ड जैसे हिन्दी बेल्ट के राज्यों का हिस्सा भी पूरा कर सकें। क्या इन राज्यों कि, राजनैतिक व विकास की नीतियों  मै  श्री मोदी कोई मूलभूत परिवर्तन ला सकते हैं कि, ये राज्य अपनी विकास दर को तीन गुना बढ़ा सके, अभी यह सम्भव नहीं लगता है।
हमारी सबसे बड़ी शक्ति हमारी जनसंख्या है, जनसंख्या में भी उसका युवातत्व। इसे हम जनसांख्यकीय लाभांश कह सकते हैं। यदि हम इस लाभांश का अधिकतम लाभ उठाना चाहते हैं तो, हमें इसकी गुणवत्ता कई गुना बढ़ानी पड़ेगी। इस हेतु बड़ा निवेश आवश्यक है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास तथा बाजार उपलब्धत्ता के क्षेत्र में पर वर्तमान निवेश में बड़ी वृद्धि आवश्यक है। यह वृद्धि कहीं दिखाई नहीं दे रही है। एक ओर हम जनसंख्या के मामले में अगले 8 वर्षों में चीन को पीछे छोड़ने जा रहे हैं, दूसरी ओर इस बढ़ती आबादी को एक गुणपूरक शक्ति में बदलने के प्रयासों का अभाव है। हमें इस दिशा में दो तरफा बढ़ने की आवश्यकता है। एक ओर हमें प्रजन्न दर को और घटाने की आवश्यकता है। वहीं शिक्षा, स्वास्थ्य व कौशल विकास पर तत्काल खर्च को तीन गुना बढ़ाना पड़ेगा। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो, हम एक कमजोर व अकुशल युवा देश होंगे। एक अनुमान के अनुसार 24 वर्ष के युवाओं की सबसे बड़ी संख्या भारत फिर चीन में है जो क्रमशः साढ़े पैंतीस करोड़ व 26 करोड़ है। जबकि अमेरिका में यह संख्या 65 लाख है। भारत, चीन, नाईजीरिया, पाकिस्तान, इथोपिया, कांगो, तंजानिया, इंडोनेशिया, मिश्र में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक है, इसलिये यहां गरीबी भी अधिक है। यही कुछ बड़े देश हैं, जहां कुपोषण, अशिक्षा, विकास व स्वास्थ्य की समस्या सर्वाधिक है। यूनाईटेड नेशन्स दशाब्दी लक्ष्यों के तहत करवायें सर्वेक्षण में चीन के अतिरिक्त अन्य देशों ने जनसंख्या वृद्वि में पर्याप्त नियंत्रण नहीं किया है। यदि भारत सहित ये देश शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल उपलब्धता, कौशल विकास के क्षेत्र में पर्याप्त निवेश नहीं करते हैं तो, स्थिति और खराब होगी। हम बहुधा जनसांख्यकीय लाभांश की बात करते हैं, जो तथ्य संगत है। आज देश में आर्थिक रूप से सक्रीय आबादी का हिस्सा आश्रित आबादी से बहुत अधिक है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2041 तक देश की आबादी में 20 वर्ष से 60 वर्ष तक के लोगों का हिस्सा लगभग साठ प्रतिशत होगा। इस स्वस्थ अवसर के उपयोग के लिये निरंतर एक दूरगामी कार्ययोजना के तहत कार्य होना चाहिये, अन्यथा यही जनसांख्यकीय लाभांश असंतोष व निराशा पैदा करेगा। इस आकंलन के साथ हमें देश में बढ़ती बुर्जगों की संख्या व उम्र से जुड़ी समस्याओं से भी निपटना होगा। इस समय राज्यों में कोई ठोस कार्यनीति इस संवर्ग के लिये नहीं है। मैंने मुख्यमंत्री के तौर पर अधिकांश बुजर्गों को पेंशन व स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत लाने को प्रयास किया था। इसलिये मैंने 60 वर्ष से ऊपर के लोगों को एक हजार रूपये तक की मासिक पेंशन को करीब-2 सारे वन्धनों से मुफ्त कर दिया था। हमारी सरकार ने एक लाख पछहत्तर हजार रूपये वार्षिक तक की स्वास्थ्य बीमा योजना प्रारम्भ की थी। अभी भारत में 60 वर्ष से ऊपर के लोगों की संख्या ग्यारह करोड़ है जो 2041 में बढ़कर पच्चीस करोड़ तक पहुंच सकती है। क्या हमारे पास इस संख्या के लिये कोई ठोस आर्थिक सुरक्षा योजना है, जिसमें आवास, स्वास्थ्य व निरंतर देख-रेख सम्मिलित हो।
कृषि विकास दर में निरंतर गिरावट चिंता का बड़ा घटक है। वर्तमान में कृषि विकास दर ढाई प्रतिशत के आस-पास है। घटती हुई जल उपलब्धता जिसमें भू-जल स्तर भी सम्मिलित है व सिकुड़ती हुई कृषि योग्य भूमि, निरन्तर घटती हुई जोत की मात्रा बड़ी चुनौती खड़ी कर रही है। किसानों की निरंतर बढ़ती हुई आत्म हत्यायें खेती के दुखड़े को स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त हैं। मैं किसानों की आत्म हत्या के मामलों में नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरों के आंकड़ों का उल्लेख करने के बजाय, अपने छोटे से राज्य उत्तराखण्ड में किसानों की आत्महत्याओं के मामलों पर चर्चा करना चाहूंगा। सन् 2017 तक उत्तराखण्ड में किसानों की आत्म हत्या का कोई प्रकरण सामने नहीं आया। इन ढेड़ वर्षों के अन्तराल में डेढ़ दर्जन किसान कर्ज वसूली के दबाव के चलते आत्म हत्या कर चुके हैं। प्रत्येेक आत्म हत्या कर्ज वसूली के दबाव को न झेल पाने के चलते हुई है। इस समय किसान हताश हैं। किसानों को पिछले 5 वर्षों में सरकारी खरीद के प्रति एफ0सी0आई0 व राज्य सरकारों की उदासीनता उनमें बनी पड़ी है। इसके चलते किसानों को समर्थन मूल्य हांसिल नहीं हुआ है। गन्ना पैदा करने वाले किसानों का लम्बे समय से बाईस हजार करोड़ रूपये से अधिक, चीनी मिलों पर बकाया है। मोदी जी के पहले कार्यकाल में खेती में सरकारी व गैरसरकारी निवेश घटा है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के हितों के खिलाफ सिद्ध हुई है। इस वर्ष के बजट में भी यदि किसानों को एक वर्ष में दी जाने वाली सीधी सहायता राशि के लिये निर्धारित बजट को अलग कर  दे तो, कृषि बजट, पिछले वर्ष के मुकाबले आधा प्रतिशत घटा है। किसानों को सीधी दी जा रही राशि, कुछ राज्यों में दी जा रही किसान पेंशन से कम है। मेरे मुख्यमंत्री काल में उत्तराखण्ड प्रतिमाह एक हजार रूपया किसान पेंशन के साथ-2 60 वर्ष से ऊपर आयु वाले किसान की पत्नी को भी एक हजार रूपया वृद्धावस्था पेंशन देते थे। नेशनल सेम्पल सर्वे आरगेनाईजेशन की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि, भारतीय किसान की सभी श्रोतों से मासिक आय का औसत पैंसठ सौ रूपये से कम है। कृषि मंत्री ने सदन में माना है कि, सन् 2022 तक किसान की आय दुगनी नहीं हो सकती है। किसान निरन्तर कर्ज के बोज में दबता जा रहा है और इस दुष्चर्क से बाहर लाने का कोई रोडमैप केन्द्र सरकार के पास नहीं है। कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के केन्द्र व राज्य सरकारों के स्तर पर कोई उपाय नहीं हो रहे हैं। राज्यों में कृषि मंत्री अपने को दोयम दर्जे का मंत्री समझते हैं। कृषि विकास दर को यू0पी0ए0 शासन काल के साढ़े चार प्रतिशत के बराबर लाना वर्तमान सरकार के लिये ऐेवरेस्ट चढ़ने जैसा लगता है।
आज जब हम पाॅच ट्रिलियन डाॅलर्स की अर्थव्यवस्था की चर्चा कर रहे हैं तो, हम इस तथ्य को नहीं भूल सकते हैं कि, देश में आज भी सैंतीस करोड़ भाई-बहन गरीब हैं। गरीबी का प्रश्न बहुत बड़ा है, इतना ही बड़ा प्रश्न गरीब की आय व अमीरों की आय में निरन्तर बढ़ती जा रही असमानता का भी है। जहां तक मनरेगा मजदूर 175 रूपया प्रतिदिन मजदूरी पा रहा है, वहीं रिलायन्स ग्रुप के अम्बानी जी लाखों की सैलरी पाने के बावजूद इसलिये सुर्खियों में हैं कि, उन्होंने पिछले तीन वर्षों से अपनी सैलरी नहीं बढ़ाई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखण्ड जैसे राज्यों को अपने नागरिकों की औसत आय को राष्ट्रीय औसत तक पहुंचाने में 20 वर्ष लगेंगे। सन् 1981 में राष्ट्रीय आय में एक प्रतिशत अमीर आबादी की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत थी, जो 2018 में बढ़ कर 21.5 प्रतिशत हो गई है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने पावर्टी इंडेक्स रिपोर्ट 2019 में जहां गरीबी घटाने के लिये भारत की प्रशंसा की है। वहीं यह भी कहा है कि, भारत के लगभग 20 करोड़ गरीब, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश व झारखण्ड में हैं। क्षेत्रीय असमानता, क्षेत्रीय असंतोष, असहिष्णुता का वातावरण तैयार करते हैं। जिनके आलोक में सुशासन व विकास पीछे रह जाता है और गरीबों की गरीबी और बढ़ती है। आक्स फैम इंडिया की आर्थिक असमानता रिपोर्ट सन् 2018 में कहा गया कि, वर्ष 2017 में देश के अरबपतियों की कुल सम्पत्ति देश की जी0डी0पी0 की 15 प्रतिशत के बराबर हो गई है। यह सम्पत्ति वर्ष 2012 में जी0डी0पी0 के 9 प्रतिशत के बराबर थी अर्थात 5 वर्षों में देश के जी0डी0पी0 सापेक्ष अरबपतियों की सम्पदा में 6 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है। रिर्पोट में यह भी कहा गया है कि, पिछले पांच वर्षों में भारत की सम्पत्ति जितनी बढ़ी है, उसका 73 प्रतिशत हिस्सा देश के एक प्रतिशत अमीरों के पास पहुंचा है। अति धनाढ्य लोग  की संख्या के हिसाब से दुनियां में हम छठे स्थान पर हैं और सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो, वर्ष 2025 तक भारत में चीन से अधिक अरबपति होंगे। आक्स फैम सहित इस क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं ने हमें विश्व का सबसे अधिक आर्थिक असमानता वाला देश चिन्हित किया है। इन संस्थाओं ने इंगित किया है कि, भारत ने आर्थिक असमानता घटाने के लिये ठोस उपाय नहीं किये हैं। सरकारी नौकरियों, अर्द्ध सरकारी संस्थाओं में शीर्ष व बाॅटम के पदों के मध्य वेतन का भारी अन्तर इस दिशा में हमारे प्रयासों का उपहास उड़ाता है। इस वर्ष सरकार ने अपने बजट  मैं  इस चुनिन्दा वर्ग पर कुछ सरचार्ज लगाये हैं, मगर यह प्रयास व्यापकता के अभाव में आधे मन से उठाया गया कदम लगता है।
भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग आधा हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है, इस क्षेत्र में श्रम बल का 90 प्रतिशत हिस्सा काम पाता है। पहले नोटबंदी फिर जी0एस0टी0 की संरचनागत कमजोरियों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव इसी क्षेत्र पर पड़ा है। असंगठित क्षेत्र को मजबूत बनाये बिना संगठित क्षेत्र में पड़ रहे दुष्प्रभाव को भी नहीं रोका जा सकता है। इस क्षेत्र को संभालने के लिये पर्याप्त सुधारात्मक उपाय लागू करना आवश्यक हैं। इस हेतु पूंजी चाहिये। सरकार ने माना है कि, जी0एस0टी0 व प्रत्यक्ष कर वसूली में आई गिरावट से सरकार के राजस्व को 1.60 लाख करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है। सरकार के लिये तत्काल संसाधन जुटाना आवश्यक है अन्यथा राजकोषीय घाटा और बढ़ेगा, अर्थव्यवस्था और चरमरायेगी। संगठित क्षेत्र में निवेश पूर्णतः ठहर गया है। विदेशी पूंजी की उपलब्धता भी घटी है। निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ाये बिना स्थिति सुधरने के आसार नहीं हैं। बैंकिग संस्थायें व गैर बैंकिग वित्तीय कम्पनियां एन0पी0ए0 की समस्या से झूज रही है। अब स्थिति स्पष्ट है कि, संसाधनों का टोटा संगठित व असंगठित दोनां क्षेत्रों के लिये बढ़ता जा रहा है। जहां तक मैं बजट को समझ पाया हॅं, सरकार ने इसका उपाय ढूंढने के बजाय चुनौती को टालने का प्रयास किया है। सरकार ने एक सरल रास्ता पैट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि का ढूंढा है। यह सहारा भी वैश्विक स्थिति पर निर्भर करता है। ईरान को लेकर व्याप्त तनाव कभी भी पैट्रोलियम पदार्थों के अन्र्तराष्ट्रीय मूल्यों को कुप्रभावित कर सकता है।
अमेरिका व यूरेपियन क्षेत्र पर हमारा 90 प्रतिशत निर्यात निर्भर करता है। पहले से ही निर्यात का क्षेत्र सरकार की नीतिगत गलतियों व जी0एस0टी0 व नोटबंदी आदि से चिन्ताजनक स्तर तक कुप्रभावित है। अमेरिका व चीन के मध्य बढ़ते तनाव तथा ट्रंप प्रशासन की केवल अमेरिका नीति से इस क्षेत्र के और डगमगाने के आसार हैं। निर्यात में गिरावट जैसे कई चुभते हुये सवाल आज हमारी अर्थव्यवस्था से समाधान मांग रहे हैं। ग्रोस कैपिटल फोरमेशन में निरन्तर आ रही गिरवट हमारी अर्थव्यवस्था को लम्बे समय तक नुकसान पहुंचा सकती है। देश के संचालक अर्थव्यवस्था के चुभते प्रश्नों का समाधान ढूंढने के बजाय आत्ममुग्ध भाव से नये-2 जुमले गढ़ रहे हैं। मैं अर्थशास्त्री नहीं हॅू, परन्तु मैं इतना समझता हॅू कि, वर्ष 1992 के बाद हमारी अर्थव्यवस्था की विकास गति की तीव्रता को देखते हुये हमारी अर्थव्यवस्था प्रत्येक पाॅंच वर्ष में दुगनी हो सकती है। पाॅंच ट्रिलियन डाॅलर्स की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य सम्भव है, परन्तु उसके लिये एक स्वस्थ राजनैतिक वातावरण चाहिये। देश में जिस प्रकार राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, असहिष्णुता बढ़ रही है, क्या आपको इसके आलोक में ऐसा लगता है कि, सरकार बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, क्षेत्रीय विकास में असंतुलन, कृषि व लघु उद्योग तथा निर्यात-व्यापार क्षेत्र की गिरावट, शिक्षा, स्वास्थ्य व कौशल विकास की चुनौतियों का हल ढूंढ रही है? सत्ता सारे देश के भगवाकरण में इन समस्याओं को स्व समाधानित मानकर व्यवहार कर रही है। आपसे भी ऐसा ही मानने की अपेक्षा कर रही है। रही-सही कसर प्रचार तंत्र का भगवाकरण पूरा कर दे रहा है।
(हरीश रावत)



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